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रमजान : रात तक खुदा से बंदगी का दौर….

कोटा. माहे रमजान में शहर की रंगत ही बदल गई है। रोजेदार इबादत के इस पवित्र माह में अपने जीवन को संवारने मंे जुटे हैंं।
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कोटा

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Anil Sharma

May 15, 2019

kota

रमजान के दौरान सजे बाजार।

कोटा. माहे रमजान में शहर की रंगत ही बदल गई है। रोजेदार इबादत के इस पवित्र माह में अपने जीवन को संवारने मंे जुटे हैंं। घर व मस्जिदों में सप्ताह भर से अलग ही आलम नजर आ रहा है। लोगों की दिनचर्या सलीकेबद्ध हो गई है, तो मस्जिदों के बार भी इन दिनों खास माहौल है। कई मस्जिदें जगमग है। बड़ी तादात में अकीदतमंद मस्जिदों मंे नमाज अदा करने पहुंच रहे हैं। मंगलवार को आठवें रमजान पर विज्ञान नगर स्थित नूरी जामा मस्जिद, छावनी बंगाली कॉलोनी, घंटाघर, स्टेशन समेत अन्य मस्जिदों में अजान के सुर गूंजे। इस दौरान तकरीर व शाम को नमाज के बाद रोजा अफ्तार के आयोजन हुए। इनमें सौहार्द की मिठास घुली। लोगों ने एक जाजम पर रोजा अफ्तार किया। मस्जिद कमेटियों की ओर से विशेष प्रबंध किए गए।
मेले सी रंगत
छावनी व विज्ञान नगर में मस्जिदों के सामने मेले जैसी रंगत नजर आई। नमाज से पहले बड़ी तादाद में नमाजी मस्जिदों में पहुंचे तो रोजा अफ्तार के बाद भी आसपास मेला लगा रहा। कई फुटकर दुकानदार भी अच्छी कमाई की आस में मस्जिदों के आसपास जमा रहे।
फिजां भी बदली
अकीदतमंदों ने बताया कि रमजान का इंतजार काफी पहले से रहता है। ये दिन आते हैं तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता। एक माह के लिए पूरी दिनचर्या बदल जाती है। विज्ञान नगर क्षेत्र में नूरी जामा मस्जिद के लुकवामन रज्वी बताते हैं कि जो व्यक्ति आमतौर पर देर सुबह तक सोते हैं, वे भी रमजान में तड़के जाग जाते हैं। दिनभर एक सिस्टम से व्यस्त रहते हैं। अनुशासित तौर पर खाना, सोना, कार्य करना, इबादत होती है।

समझ आता है गैरों का दर्द
ईश्वर-अल्लाह ने जो भी व्यवस्थाएं की है, इनके पीछे कोई न कोई खास मकसद है। अल्लाह ने मुसलमानों के लिए जो पांच फर्ज दिए हैं, इन्ही में से रमजान एक है।
यह कहना है रोडवेज विभाग में परिष्ठ परिचालक लियाकत खान तंवर का। बारां रोड शिवनगर निवासी लियाकत बताते हैं कि माहे रमजान यूं तो इबादत कर अपने आप को खुदा को समर्पित करने का नाम है, लेकिन इसके मायने और भी हैं। यह रब से इंसान को जोडऩे के साथ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इंसान को इंसान से भी जोड़ता है। यह महीना एक दूसरे के दर्द व खुशियों को समझने का है। रोजा रखने का तात्पर्य यह भी है कि इंसान को यह अहसास हो कि आखिर जिन लोगों को एक वक्त की रोटी भी नसीब नहीं वे किन हालातों में जीते होंगे। एेसे स्थान जहां पानी नहीं मिलता होगा, कैसे रहते होंगे।
जब यह सब समझ में आ जाता है तो इंसान अपने आप गैरों की पीड़ा को अपना बना लेता है। रमजान में पांच वक्त की नमाज रोजेदार कोसृष्टि के मालिक के करीब लाती है। सुकून व शांति इसी बात में है। एक माह के तप के बाद ईद आती है तो लगता है कि मालिक ने सारे जहां की खुशियों रोजेदार पर न्यौछावर कर दी।