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मौत के बाद अपने ही घर में अंतिम संस्कार करने पर मजबूर है ये समाज – वजह जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर

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कोटा

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rohit sharma

Aug 28, 2018

Samadhi in homes

मौत के बाद अपने ही घर में अंतिम संस्कार करने पर मजबूर है ये समाज - वजह जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर

कोटा.

सत्तावन साल के प्रभुनाथ पिछले बीस साल से बोरखेड़ा में अपने मकान में रह रहे थे। जब उनकी मौत हुई तो शहरभर में कहीं उन्हें अंतिम संस्कार की जगह नहीं मिली, नतीजा उन्होंने घर के जिस आंगन में अपनी उम्र के काफी साल बिताए, उसी आंगन में उनका अंतिम संस्कार करना पड़ा, वहीं उनके परिवार ने उनकी समाधि बनाई। प्रभुनाथ ऐसे अकेले शख्स नहीं हैं। कोटा में शहर में रहने वाले नाथ योगी समाज के अधिकांश घरों में उनके परिजनों का अंतिम संस्कार मजबूरी बन गया है। ऐसे घरों के आंगन में उनके पूर्वजों की समाधियां देखी जा सकती हैं। जिन घरों में आंगन नहीं हैं अथवा आंगन में समाधियां बन चुकी हैं। उन घरों में कमरों में अंतिम संस्कार कर समाधियां बनानी पड़ रही हैं।

समाज की मांग सरकार तक नहीं पहुंची
राज्य सरकार अथवा नगर विकास न्यास इस समाज को शहर में एक अदद मुक्तिधाम तक के लिए जमीन नहीं दे सका। समाज के करीब पचास हजार से अधिक लोग शहर में रहते हैं। कुन्हाड़ी में एक स्थान पर बरसों से जमीन के एक टुकड़े पर समाज अपने लोगों के अंतिम संस्कार करता रहा, जिसे 2013 में सरकार ने एक स्कूल को आवंटित कर दिया। पिछले महीने इस पर विवाद भी हो चुका है। इसके बाद समाज की मांग सरकार के कानों तक नहीं पहुंची।

यह है समस्या
नाथ योगी, दशनाम गोस्वामी समाज में मौत के बाद समाधि देने की परम्परा है। समाज के लोगों का कहना है कि वे मुक्तिधामों में जाते हैं तो वहां समाधि बनाने पर विरोध हो जाता है। ऐसे में उन्हें अलग से जमीन दी जानी चाहिए। समाज शव को समाधिस्थ कर उस पर एक छोटा चबूतरा बना कर उस पर शिवलिंग स्थापित करता है। समाज से जुड़े डॉ. विपिन योगी के अनुसार हमारे समाज ने कई बार जमीन के लिए प्रयास किया, लेकिन हमारी बात सुनने की जगह हमें अधिकारियों ने कहा कि हम अंतिम संस्कार का तरीका ही बदल दें। इस वजह से अधिकांश शवों को घरों में ही समाधि देना हमारी मजबूरी बन गया है।

समाधि देने की सनातन परम्परा
समाज के नरेश व रमाशंकर योगी बताते हैं कि घर में समाधि देने पर कई बार भय के चलते साथ उठने बैठने वाले आस पड़ोस के लोग विरोधी हो जाते हैं। वे अंतिम संस्कार न करने देने पर अड़ जाते हैं। ज्यादातर के तो घरों में अब जगह नहीं बची है। डॉ. योगी के अनुसार नाथ सम्प्रदाय में समाधि देने की परम्परा सनातन है। गुरु गोरक्षनाथ के अवतरण काल से ही इस शैव मत को मानने वालों में यह परम्परा है। इसमें नाथ योगी, जोगी, गिरी, पुरी, रावल, जंगम पटवा, गोस्वामी समेत नवनाथ बारह पंथ के अनुयायी शामिल हैं।

गांवों में बाड़े हैं, शहरों में दिक्कत
गुरु गोरक्षनाथ आश्रम के संत प्रेमनाथ योगी व कर्णेश्वर महादेव मंदिर कंसुआ के पुजारी श्याम गिरी बताते हैं कि नाथ योगी, दशनाम गोस्वामी समाज में ठोस समाधि की परम्परा है। श्याम गिरी बताते हैं कि गांवों में तो अपने खेत, बाड़े में दिवंगत को समाधि दे दी जाती है, लेकिन शहरों में जगह की समस्या हो गई है। इससे अपने रीति रिवाज बदलने पड़ रहे हैं।

घरों के ऐसे हो गए हालात
घर में समाधियां, जगह नहीं: लाडपुरा कर्बला क्षेत्र में तो प्रेमप्रकाश योगी के छोटे से घर के चौक में दो समाधि बनी हुई हैं। दो समाधि बनाने के बाद चौक में मुश्किल से 3 से 4 फीट जगह रह गई है। अन्य घरों में भी यही हालात है।
किराएदार न खरीदार : गौरी शंकर, रमाशंकर व नरेश योगी बताते हैं कि मकान में समाधियां होने से भय के कारण किराएदार आते ही नहीं हैं। कोई मकान बेचकर बड़ा लेना चाहे तो खरीदार नहीं मिलते। समाधियों को छोड़कर दूसरे घर में जाना भी अच्छा नहीं लगता।