
बूंदी. दुनिया में उडऩे वाले पक्षियों में सबसे बड़े पक्षी के रूप में पहचान बनाने वाले सारस पक्षियों का कलरव बूंदी जिले में 2 वर्ष बाद फिर से देखने को मिल गया। जिले के बरधा व अभयपुरा वेटलैंड पर इन पक्षियों का पहुंचना शुरू हो गया है, जो पर्यावरण एवं बूंदी के इको-टूरिज्म के लिए शुभ संकेत माने जा रहे हैं।
सारस पक्षी पूरे सालभर यहां के जलाशयों पर देखे जाते रहे हैं, लेकिन विगत 2 वर्षों से जिले के किसी भी वेटलैंड पर सारस नजर नहीं आए। इस वर्ष जनवरी में हुई पक्षियों की गणना व मई में हुई वन्यजीव गणना में भी सारसों की संख्या शून्य रही थी। सारस के जिले से पलायन कर जाने से वन विभाग व वन्यजीव प्रेमी चिंतित थे।
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यहां रहता था सारस का आशियाना
जिले के प्राकृतिक जल स्रोत सारस के पसंदीदा आश्रय स्थल रहे हैं। हिण्डोली की रामसागर झील, तलवास की रतन सागर झील, गुढ़ा बांध, भीमलत-अभयपुरा वेटलैंड, नैनवां की नवल सागर झील, पाईबालापुरा बांध, खटकड़ क्षेत्र की मेज नदी, तालेड़ा क्षेत्र की कुरेल नदी सहित जिले के नहरी इलाकों के धान के खेतों में सारस के जोड़े दर्जनों की संख्या में विचरण करते दिख जाते थे।
हाड़ौती में पक्षी-दर्शन की प्रबल संभावनाएं
हाड़ौती में चंबल के अलावा अन्य नदियां व यहां के सदाबहार जल स्रोत पक्षियों के प्रमुख आश्रय स्थल है। कोटा के आलनिया डेम, उम्मेदगंज पक्षी-विहार, अभेड़ा तालाब, बारां के अमलसरा, सोरसन तथा झालावाड़ के खाण्डिया तालाब व लक्ष्मीपुरा तालाब पक्षियों के लिए उत्तम आश्रय स्थल है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में बर्ड वॉचिंग एक महत्वपूर्ण उभरता पर्यटन व्यवसाय बनने लगा है। हाड़ौती में इसकी प्रबल संभावनाएं है।
गिद्धों को मिला संरक्षण
लुप्तप्राय: हुए गिद्धों ने भी यहां पहाड़ी कन्दराओं में अपना आशियाना बना रखा है। चंबल के अलावा बूंदी के बरड़ क्षेत्र व भीमलत के नाले में गिद्धों की कॉलोनी बसी हुई है।
बूंदी पूर्व मानद वन्यजीव प्रतिपालक, पृथ्वी सिंह राजावत इस सुंदर पक्षी के जिले में बरधा व अभयपुरा बांधों पर फिर से लौटने से उम्मीद है कि शीघ्र ही जिले के अन्य जल स्रोतों पर भी सारस का कलरव सुनाई देगा। इको- टूरिज्म के लिए यह शुभ संकेत है।
Published on:
09 Oct 2017 07:02 pm
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