
कुत्तों को मारने के लिए खेतों में रखा गया था कार्बोफ्यूरान मिला चावल, दुधवा क्षेत्र में वन्यजीव सुरक्षा पर उठे सवाल (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group)
Dog Poisoning 25 Vulture Death: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में 25 हिमालयन ग्रिफॉन गिद्धों की मौत ने वन्यजीव संरक्षण तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। अब इस मामले में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, गिद्धों और दो जंगली कुत्तों की मौत अत्यधिक जहरीले कीटनाशक “कार्बोफ्यूरान” के सेवन से हुई।
वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, खेतों में आवारा कुत्तों को मारने के उद्देश्य से कार्बोफ्यूरान मिले चावल रखे गए थे। उन चावलों को खाने से पहले कुत्तों की मौत हुई और बाद में उन्हीं कुत्तों के शवों को खाने वाले 25 दुर्लभ हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध भी जहरीले प्रभाव का शिकार हो गए।
यह पूरी घटना 7 अप्रैल को लखीमपुर खीरी जिले के भीरा फॉरेस्ट रेंज के पास सामने आई थी, जहां खेतों में बड़ी संख्या में गिद्धों के शव पड़े मिले थे। एक साथ इतने गिद्धों की मौत से वन विभाग और स्थानीय प्रशासन में हड़कंप मच गया था। प्रारंभिक जांच में जहरीले पदार्थ से मौत की आशंका जताई गई थी, जिसके बाद नमूनों को जांच के लिए IVRI भेजा गया।
शनिवार को आई IVRI की रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि मृत गिद्धों और कुत्तों के शरीर में “कार्बोफ्यूरान” नामक अत्यधिक जहरीला कीटनाशक पाया गया। यह कार्बोमेट श्रेणी का कीटनाशक है, जिसका इस्तेमाल फसलों में कीड़े-मकौड़ों को खत्म करने के लिए किया जाता है। हालांकि इसके उपयोग को लेकर भारत में सख्त नियम लागू हैं, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में इसका अवैध और लापरवाह इस्तेमाल जारी है।
वन अधिकारियों के अनुसार, आरोप है कि खेतों में कार्बोफ्यूरान मिलाकर पका हुआ चावल रखा गया था ताकि आवारा कुत्तों को मारा जा सके। यह कीटनाशक बेहद जहरीला होता है और जीवों के शरीर में तेजी से असर करता है। चावल खाने के बाद कुत्तों की मौत हो गई और फिर गिद्धों ने उन शवों को खा लिया। इसके बाद जहरीले रसायन का प्रभाव गिद्धों पर पड़ा और कुछ ही समय में उनकी भी मौत हो गई।
जांच टीम ने घटनास्थल से पके हुए चावल के नमूने, मृत कुत्तों और गिद्धों के ऊतक (टिश्यू) नमूने एकत्र किए थे। प्रारंभिक रिपोर्ट में विषाक्तता की संभावना मिलने के बाद सभी नमूनों को IVRI भेजा गया था। अब रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मौत का कारण जहरीला कीटनाशक ही था।
लखीमपुर खीरी का यह इलाका विश्व प्रसिद्ध दुधवा टाइगर रिजर्व के बेहद करीब स्थित है। नेपाल सीमा से सटे तराई क्षेत्र में फैला दुधवा अपनी जैव विविधता, दलदली घास भूमियों, घने जंगलों और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए जाना जाता है। यहां बाघ, हाथी, बारहसिंगा, गैंडा और कई संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। सूत्रों का कहना है कि गिद्धों की सामूहिक मौत केवल एक वन्यजीव त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे का संकेत है। गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी माने जाते हैं। वे मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को साफ रखते हैं और बीमारियों के फैलाव को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं।
भारत में गिद्धों की कई प्रजातियां पहले ही संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल हैं। एक समय देशभर में बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले गिद्ध अब तेजी से कम हो रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, जहरीले रसायनों, दवाओं और पर्यावरणीय बदलावों ने इनकी आबादी को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसी तरह जहरीले पेस्टीसाइड का इस्तेमाल जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में गिद्धों की कई प्रजातियां पूरी तरह खत्म हो सकती हैं।
घटना के बाद वन विभाग ने जांच तेज कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि अब जब रिपोर्ट में जहर से मौत की पुष्टि हो चुकी है, तो दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) कीर्ति चौधरी ने कहा, “अब यह स्पष्ट हो चुका है कि गिद्धों और कुत्तों की मौत जहरीले पदार्थ से हुई। विभाग आरोपियों का पता लगाकर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।” वन विभाग ने आसपास के गांवों में लोगों को जागरूक करने की भी योजना बनाई है, ताकि प्रतिबंधित और खतरनाक कीटनाशकों के उपयोग से होने वाले दुष्परिणामों को समझाया जा सके।
पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इस घटना पर गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि खेतों में जहरीले पदार्थ डालकर जानवरों को मारना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह पूरे पर्यावरण और खाद्य श्रृंखला के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। कृष्णा पांडेय ने सरकार से मांग की है कि कार्बोफ्यूरान जैसे अत्यधिक जहरीले रसायनों की बिक्री और उपयोग पर सख्त निगरानी रखी जाए। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाकर किसानों और स्थानीय लोगों को इसके दुष्प्रभावों के बारे में बताया जाए।
25 गिद्धों की मौत की खबर सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रही है। लोग इस घटना पर दुख जता रहे हैं और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। कई पर्यावरण संगठनों ने इसे वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की बड़ी चुनौती बताया है।
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि मानव गतिविधियों और रासायनिक उपयोग का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव जंगलों, वन्यजीवों और पूरे पर्यावरण पर पड़ता है। यदि समय रहते जहरीले रसायनों के अनियंत्रित उपयोग पर रोक नहीं लगी, तो इसका परिणाम आने वाले समय में और भी भयावह हो सकता है। दुधवा जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र में हुई यह घटना पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आई है।
Published on:
17 May 2026 11:00 am
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