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मिलिए भारत के गन्ने में मिठास भरने वाली उस अनजान महिला से, जिसे जाति और लिंग के कारण छोड़ना पड़ा देश

E. K. Janaki Ammal: आज हम एक ऐसी साहसी भारतीय महिला के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी हिम्मत और दृढ़ संकल्प के दम पर भारत की किस्मत बदल दी। आइए जानते हैं कि वह महिला कौन हैं और उन्होंने अपने दम पर भारत का नाम कैसे रोशन किया।

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E. K. Janaki Ammal

E. K. Janaki Ammal | image credit gemini

E. K. Janaki Ammal: आज के समय में जब भी महिलाओं के अधिकार की बात शुरू होती है, तो ज्यादातर लोग महिलाओं को मिलने वाले रिजर्वेशन की बातें करने लगते हैं। लेकिन हकीकत तो ये है कि आज भी सरकार की तरफ से महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए चलाई जा रही योजनाओं और रिजर्वेशन देने के बाद भी, अगर डेटा के हिसाब से देखा जाए तो महिलाएं पीछे हैं। ऐसे में सोचिए, जिस समय में महिलाओं को घर से बाहर अकेले निकलना मना था, उस जमाने में कैसे एक महिला ने अपनी हिम्मत के दम पर भारत की किस्मत बदल दी। फिर भी इन्हें अपनी जाति और महिला होने की वजह से अपना ही देश छोड़ना पड़ा। आज की कहानी में हम एक ऐसी ही साहसी भारतीय महिला के बारे में बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं कौन वो महिला है और कैसे उन्होंने अपने दम पर भारत का नाम रोशन किया।


शादी का मंडप नहीं, साइंस लैब चुनी


यह कहानी है भारत की पहली महिला प्लांट साइंटिस्ट ई. के. जानकी अम्माल की। केरल के थालास्सेरी में 1897 में जन्मी जानकी अम्माल उस दौर में बड़ी हो रही थीं, जब लड़कियों से सिर्फ घर संभालने और शादी करने की उम्मीद की जाती थी। लेकिन उन्होंने 1932 में एक ऐसा रास्ता चुना जिसके बारे में तब की महिलाएं सोच भी नहीं सकती थीं। उन्होंने अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और ऐसा करने वाली वो पहली भारतीय महिला बनीं। जब वो पढ़ाई पूरी करके भारत लौटीं, तो उनके पास सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि देश की मिट्टी को बदलने का एक बड़ा विजन था।


जब गन्ने की मिठास के लिए तरसता था इंडिया


आज हम गर्मियों में जो गन्ने का जूस बड़े मजे से पीते हैं, उसके पीछे जानकी अम्माल की सालों की मेहनत है। उस जमाने में भारत अच्छी वैरायटी के गन्ने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था। तब जानकी अम्माल ने कोयंबटूर के 'शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट' में अपनी रिसर्च शुरू की। उन्होंने गन्ने की ऐसी हाइब्रिड वैरायटी तैयार की जो भारत की गर्मी और मिट्टी को झेल सके और भरपूर मिठास दे। उनकी इस मेहनत ने भारत को गन्ने के उत्पादन में दुनिया के टॉप देशों में खड़ा कर दिया।

काबिलियत पर भारी पड़ा समाज का भेदभाव


इतना बड़ा काम करने के बाद भी, जानकी अम्माल को वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वो हकदार थीं। उन्हें अपने काम की जगह पर सिर्फ इसलिए नीचा दिखाया गया क्योंकि वो एक महिला थीं और उनकी जाति को लेकर भी भेदभाव किया गया। उन्हें तालियों से ज्यादा अपमान मिला। इसी के चलते उन्होंने अपना देश छोड़ना बेहतर समझा और इंग्लैंड चली गईं। वहां उन्होंने अपनी रिसर्च जारी रखी और एक खास 'मैग्नोलिया' फ्लावर डेवलप किया, जो आज भी वहां उनके नाम से पहचाना जाता है।


विदेश में डंका और वतन वापसी का सफर


इंग्लैंड में जानकी अम्माल ने दुनिया के मशहूर वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 'क्रोमोसोम एटलस' जैसी ऐतिहासिक किताब लिखी। लेकिन उनका दिल हमेशा भारत के लिए धड़कता रहा। इसलिए आजादी के बाद दोबारा वो भारत वापस आईं और 'बॉटनीकल सर्वे ऑफ इंडिया' (BSI) को नए सिरे से खड़ा किया। उन्होंने इलाहाबाद, जम्मू और मद्रास के बड़े रिसर्च सेंटर्स में अपनी सेवाएं दीं। वह 1984 में अपनी आखिरी सांस तक मद्रास की एक लैब में काम करती रहीं। गन्ने से बनने वाला आज चीनी का हर एक दाना इस बात का सबूत है कि अगर एक लड़की हिम्मत करे, तो वह पूरे देश का भविष्य बदल सकती है।

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