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Titanic Anniversary: वो 4 बड़ी गलतियां जिन्होंने ‘कभी न डूबने वाले’ जहाज को समंदर की कब्र बना दिया

Titanic History in Hindi: आज के इस लेख में आइए जानते हैं टाइटैनिक के बनने से लेकर डूबने तक की पूरी कहानी विस्तार से।

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Titanic Anniversary

Titanic Anniversary| image credit gemini

Titanic Ki Pehli Yatra: आपने कभी ना कभी टाइटैनिक का नाम तो सुना ही होगा और शायद इस पर बनी फिल्म भी देखी होगी। अगर आप इसके बारे में थोड़ा भी जानते हैं, तो आपको जानकर हैरानी होगी कि आज का दिन यानी 10 अप्रैल वही तारीख है, जब साल 1912 में टाइटैनिक अपनी पहली और आखिरी यात्रा पर निकला था। इंग्लैंड से न्यूयॉर्क के लिए निकले इस जहाज को लेकर किसे पता था कि यह सफर शुरू होते ही खत्म हो जाएगा। आइए आज के इस लेख में जानते हैं टाइटैनिक के बनने से लेकर डूबने तक की पूरी कहानी विस्तार से।

कितने दिनों में बना था टाइटैनिक (The Construction of Titanic)


इंजीनियरिंग का करिश्मा माने जाने वाले उस वक्त के सबसे बड़े और लग्जरी जहाज टाइटैनिक को बनाने का काम 31 मार्च, 1909 को शुरू हुआ था। इसे तैयार करने में करीब 26 महीने लगे और 31 मई, 1911 को यह पूरी तरह बनकर तैयार हो गया। जब यह पहली बार सबके सामने आया, तो इसे देखने के लिए एक लाख से भी ज्यादा लोगों की भीड़ जुट गई थी। इसकी मजबूती को देखते हुए इसे बनाने वाली कंपनी का दावा था कि यह जहाज'कभी नहीं डूब सकता।

आज के ही दिन शुरू हुई थी पहली यात्रा (The Maiden Voyage)


10 अप्रैल, 1912 को टाइटैनिक इंग्लैंड के साउथैम्प्टन से अपनी पहली यात्रा (Maiden Voyage) पर रवाना हुआ। जहाज पर करीब 3,000 लोग सवार थे, जिनमें बड़े-बड़े बिजनेसमैन से लेकर आम लोग तक शामिल थे। इस जहाज में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। इसमें जिम से लेकर लाइब्रेरी तक, सब कुछ किसी आलीशान महल जैसा था। अगर आज के समय से तुलना करें, तो इसका टिकट करीब 50 लाख रुपये से भी ज्यादा महंगा होता। उस वक्त कोयले की कमी चल रही थी, जिसकी वजह से कई दूसरे जहाजों की यात्रा रोककर उनके यात्रियों को भी टाइटैनिक में ही शिफ्ट कर दिया गया था।

वो खतरनाक टक्कर (The Fatal Collision)


साउथैम्प्टन से रवाना होने के बाद सफर के शुरुआती चार दिन बड़े मजे में बीते, लेकिन 14 अप्रैल की रात ने सब कुछ उजाड़ दिया। रात के करीब 11:40 बजे टाइटैनिक एक बहुत बड़े आइसबर्ग यानी बर्फ के पहाड़ से टकरा गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जहाज के क्रू को पहले ही 6 बार बर्फ की चट्टानों की चेतावनी मिली थी, लेकिन फिर भी जहाज की रफ्तार कम नहीं की गई। एक बड़ी गलती यह भी हुई कि दूरबीन (Binoculars) लॉकर में बंद थे, जिसकी वजह से प्रहरियों को सामने खड़ा आइसबर्ग तब दिखा जब बहुत देर हो चुकी थी।

समंदर में मची चीख-पुकार (The Sinking of Titanic)


टक्कर के बाद जहाज के निचले हिस्से में तेजी से पानी भरने लगा और धीरे-धीरे टाइटैनिक डूबने लगा। पूरे जहाज पर अफरा-तफरी मच गई। उस वक्त जहाज पर सिर्फ 20 लाइफबोट्स थीं, जो सभी यात्रियों को बचाने के लिए काफी नहीं थीं। बचाव के दौरान सबसे पहले महिलाओं और बच्चों को निकालने की कोशिश की गई। मौत सामने देखकर भी जहाज के म्यूजिशियन आखिरी पल तक संगीत बजाते रहे ताकि लोग शांत रह सकें। टक्कर के करीब 2 घंटे 40 मिनट बाद टाइटैनिक पूरी तरह उत्तरी अटलांटिक सागर में डूब गया। उस समय पानी का तापमान -2°C था, जिसमें कोई भी इंसान 15 मिनट से ज्यादा जिंदा नहीं रह सकता था। रिपोर्ट के अनुसार, इस हादसे में लगभग 1500 लोगों की जान चली गई।

मलबे की तलाश (Discovery of the Wreckage)


टाइटैनिक के डूबने के बाद उसे ढूंढना लगभग नामुमकिन माना जा रहा था। समंदर की गहराइयों में छिपे इस जहाज को खोजने में 75 साल लग गए। आखिरकार 1 सितंबर, 1985 को समुद्र की गहराई में इसका मलबा (Wreckage) दो टुकड़ों में मिला। टाइटैनिक की यह कहानी आज भी लोगों की रूह कंपा देती है। इसलिए इस हादसे के बाद पूरी दुनिया में जहाजों के नियम बदल दिए गए। अब हर जहाज पर इतने लाइफबोट्स रखना अनिवार्य है कि हर एक यात्री की जान बचाई जा सके और साथ ही 24 घंटे रेडियो कम्युनिकेशन चालू रखना भी जरूरी कर दिया गया है।