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Friends With Benefits: ‘कोई नहीं मिला तो तू तो है ही…’ क्या आप भी बने है अपने दोस्त का बैकअप? जानिए क्यों खत्म हो रहा है ये ट्रेंड

Friends With Benefits: क्या आपने भी अपने बेस्ट फ्रेंड से 'मैरिज पैक्ट' किया था? जानिए क्यों 90 के समय का यह फिल्मी ट्रेंड अब असल जिंदगी और स्क्रीन, दोनों से गायब हो रहा है और लोग बैकअप बनने के बजाए अकेले रहना क्यों पसंद कर रहे हैं।

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भारत

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Pratiksha Gupta

Jan 23, 2026

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Freinds With Benefits | (फोटो सोर्स- GeminiAI)

Friends With Benefits: ​90 के समय की रोमांटिक फिल्मों ने हमें कई हसीन सपने दिखाए। इन्हीं में से एक था, 'मैरिज पैक्ट'। यानी कि दो दोस्त एक-दूसरे से वादा करते हैं कि अगर एक फिक्स उम्र (अक्सर 30 या 40 साल) तक हम दोनों सिंगल रहें, तो हम आपस में ही शादी कर लेंगे। सुनने में यह बहुत फिल्मी और क्यूट लगता है, लेकिन क्या रियल लाइफ में कोई किसी का प्लान-बी बनना चाहता है?

जब फिल्मों ने बेचा सेफ्टी नेट का सपना

​पुरानी मूवीज में हम अक्सर देखा करते थे कि हीरो हीरोइन बेस्ट फ्रेंड्स हैं और मजाक-मजाक में वादा करते हैं कि कोई नहीं मिला तो तू तो है ही। हॉलीवुड सीरीज Friends में मोनिका और चैंडलर का रिश्ता हो या Jaane Tu… Ya Jaane Na जैसी मूवीज, यह आइडिया हमेशा से ही एक इमोशनल सेफ्टी नेट की तरह दिखाया जाता था। लेकिन अगर ध्यान दिया जाए तो यह वादा प्यार से ज्यादा अकेले रह जाने के डर से पैदा हुआ था।

​प्लान-बी होने का छुपा हुआ अपमान

​मैरिज पैक्ट के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें एक अनकहा अपमान छुपा होता है। इसका मतलब है कि आप अपने दोस्त की पहली पसंद नहीं, बल्कि एक बैकअप है। जब आप दुनिया भर में अपना सच्चा प्यार ढूंढ़ने में नाकाम रहेंगे, तब समझौता करने के लिए उस दोस्त के पास लौटेंगे। आज की जनरेशन इस कॉम्प्रोमाइज के बजाए अपनी शर्तों पर जीना ज्यादा पसंद कर रही है।

​असल जिंदगी में क्यों फेल हुए ये वादे?

​रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे पैक्ट अक्सर डेटिंग की थकान और सामाजिक दबाव (जैसे शादी की उम्र निकल जाना) के कारण किए जाते हैं। हकीकत में जब लोग इन वादों को निभाते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि एक अच्छा दोस्त होना और एक अच्छा जीवनसाथी होना, दो अलग बातें हैं। 20 की उम्र में किया गया वादा 30 की उम्र तक आते-आते बोझ लगने लगता है क्योंकि इंसान की प्रायोरिटी बदल जाती हैं। कई बार दोस्त को बैकअप समझकर रखा जाता है, लेकिन जैसे ही किसी को सच्चा प्यार मिलता है, वह दोस्त सिर्फ ब्राइड्समेड बनकर रह जाता है।

बदल गया है सिनेमा और सोच का नजरिया

अब कहानियों का रुख बदल चुका है। Dear Zindagi, Piku और Barbie जैसी फिल्में हमें सिखाती हैं कि अकेले रहना कोई सजा नहीं है। आज का यूथ 'अगर कोई नहीं मिला तो तुम सही' वाली सोच से आगे निकल चुका है। सेल्फ- डिपेंडेंट होना अब कोई प्लान-बी नहीं, बल्कि एक प्राउड माना जा रहा है।