6 मई 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अखिलेश यादव बोले- फंडिंग की कमी के कारण I-PAC से तोड़ा नाता, हमारे कार्यकर्ता ही बनाएंगे रणनीति

Akhilesh Yadav News : समाजवादी पार्टी ने चुनाव रणनीतिकार संस्था I-PAC से नाता तोड़ लिया है। अखिलेश यादव ने 'फंड की कमी' को मुख्य कारण बताते हुए कहा कि अब पार्टी बाहरी सलाहकारों के बजाय अपने कार्यकर्ताओं और जमीनी संगठन के दम पर 2027 का चुनाव लड़ेगी।

2 min read
Google source verification

अखिलेश यादव बोले- फंडिंग की कमी के कारण तोड़ा I-PAC से नाता, PC- ANI

लखनऊ : समाजवादी पार्टी (SP) ने चुनावी रणनीतियां बनाने वाली मशहूर संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के साथ अपना पेशेवर सफर आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया है। बुधवार को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस हाई-प्रोफाइल सहयोग के अंत की घोषणा की। इस फैसले को भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच बेहद अहम माना जा रहा है।

मीडिया से मुखातिब होते हुए अखिलेश यादव ने उन तमाम अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें इस अलगाव को राजनीतिक नाराजगी बताया जा रहा था। अखिलेश ने साफ किया कि अनुबंध (Contract) खत्म करने का फैसला पूरी तरह वित्तीय मजबूरियों के कारण लिया गया है।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, एक बड़े पैमाने पर डेटा-आधारित कंसल्टेंसी को बनाए रखने के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता होती है। पार्टी ने अब इस फंड को जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने में लगाने का निर्णय लिया है।

बंगाल में TMC की हार और I-PAC का गिरता ग्राफ?

इस घोषणा के समय ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज कर दी हैं। हाल ही में 4 मई के चुनावी नतीजों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में आए सियासी भूकंप ने सबको चौंका दिया है। 2026 के जनादेश में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC का पतन हुआ, जो लंबे समय से I-PAC की क्लाइंट रही थी।

बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने 'जायंट किलर' बनते हुए ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ भवानीपुर में मात दी, जिसके बाद राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार का रास्ता साफ हुआ। जानकारों का मानना है कि TMC के इस ढहते किले को देखकर सपा भी अपनी रणनीति को लेकर सतर्क हो गई है, हालांकि अखिलेश यादव ने इन बातों को महज अफवाह बताया है।

डिजिटल ब्रांडिंग' से 'जमीनी संघर्ष' की ओर वापसी

I-PAC से अलग होना समाजवादी पार्टी की रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। पार्टी अब डिजिटल-फर्स्ट दृष्टिकोण और बाहरी सलाहकारों की ब्रांडिंग को छोड़कर, अपने पारंपरिक कैडर-आधारित (कार्यकर्ता आधारित) मॉडल की ओर लौट रही है।

अब पार्टी बाहरी रणनीतिकारों के बजाय अपने कार्यकर्ताओं के दम पर जनता के बीच जाएगी। उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनावी चक्र के लिए सपा खुद को पूरी तरह क्षेत्रीय पहचान और आंतरिक संसाधनों के साथ तैयार करना चाहती है। महंगे चुनावी अभियानों के बजाय अब ध्यान सीधे जनसंपर्क और संगठनात्मक मजबूती पर होगा।

एक तरफ जहां भाजपा अपने 'डबल इंजन' मॉडल और आधुनिक चुनाव प्रबंधन के साथ नए क्षेत्रों में विस्तार कर रही है, वहीं अखिलेश यादव का यह 'गैजेट्स के बजाय जमीन' वाला दांव कितना कारगर होगा, यह भविष्य के गर्भ में है।