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79 साल बाद भी ‘चमारी’ और ‘चमरौली’ गांव के नाम पर विवाद, डॉ. लालजी निर्मल ने उठाई बदलने की मांग

MLC Lalji Prasad Nirmal: डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने जालौन के ‘चमारी’ और उन्नाव के ‘चमरौली’ गांव के नामों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि आजादी के 79 साल बाद भी ऐसे नाम सामाजिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करते हैं।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Mar 10, 2026

आजादी के 79 साल बाद भी जालौन में ‘चमारी’ और उन्नाव में ‘चमरौली’ गांव: डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने जताई आपत्ति (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group)

आजादी के 79 साल बाद भी जालौन में ‘चमारी’ और उन्नाव में ‘चमरौली’ गांव: डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने जताई आपत्ति (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group)

MLC Lalji Prasad Nirmal Demands Renaming ‘Chamari’ and ‘Chamrauli’ Villages in UP : उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष और विधान परिषद के सदस्य रहे डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने जालौन और उन्नाव जिलों में मौजूद कुछ गांवों के नामों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि आजादी के 79 साल बाद भी यदि किसी गांव का नाम ‘चमारी’ या ‘चमरौली’ जैसा है तो यह सामाजिक संवेदनशीलता और जागरूकता पर सवाल खड़ा करता है। डॉ. निर्मल ने कहा कि वे जल्द ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इन गांवों के नाम बदलने का आग्रह करेंगे, ताकि समाज में समानता और सम्मान की भावना को और मजबूत किया जा सके।

‘चमारी’ नाम पर जताया आश्चर्य

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने जालौन जिले के एक गांव का नाम ‘चमारी’ होने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यह नाम आज के दौर में बिल्कुल भी उचित नहीं लगता। उनका कहना है कि इस तरह के नाम समाज में जातिगत पहचान और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।

उन्होंने कहा कि यह भी आश्चर्य की बात है कि इतने वर्षों से यह नाम चला आ रहा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे बदलने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। डॉ. निर्मल ने कहा कि आज के समय में समाज तेजी से आगे बढ़ रहा है और ऐसे नामों को बदलकर सकारात्मक संदेश दिया जा सकता है।

उन्नाव में भी ‘चमरौली’ गांव

डॉ. निर्मल ने बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि उन्नाव जिले में भी ‘चमरौली’ नाम का एक गांव है। उन्होंने कहा कि यह भी उसी तरह का उदाहरण है, जहां गांव का नाम जातिगत पहचान से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि इस तरह के नाम न केवल सामाजिक असमानता की याद दिलाते हैं बल्कि नई पीढ़ी के मन में भी गलत संदेश दे सकते हैं। इसलिए समय की मांग है कि ऐसे नामों को बदलकर अधिक सम्मानजनक और सकारात्मक नाम दिए जाएं।

मुख्यमंत्री से करेंगे मुलाकात

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर इस मुद्दे को उनके सामने रखेंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सामाजिक समरसता और समानता के लिए लगातार काम कर रही है, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेगी। उन्होंने कहा कि गांवों के नाम बदलने से केवल एक औपचारिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि इससे समाज को यह संदेश भी जाएगा कि हम जातिगत भेदभाव और अपमानजनक प्रतीकों से आगे बढ़ना चाहते हैं।

गांधी और अंबेडकर के विचारों का अंतर

डॉ. निर्मल ने इस मुद्दे पर बात करते हुए महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गांधी और अंबेडकर दोनों ने समाज सुधार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए, लेकिन उनके अनुभव अलग-अलग थे। डॉ. निर्मल के अनुसार, गांधी ने दलितों के उत्थान के लिए आवाज उठाई, लेकिन उन्होंने स्वयं दलित जीवन का दर्द नहीं झेला था। वहीं डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलित समाज की पीड़ा को स्वयं जिया और उसे गहराई से समझा। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि डॉ. अंबेडकर के विचारों में दलित समाज की वास्तविक समस्याओं और संघर्षों की झलक अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

सामाजिक जागरूकता की जरूरत

डॉ. निर्मल ने कहा कि आज के समय में समाज को अधिक संवेदनशील और जागरूक बनने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय की पहचान उसके सम्मान और समानता के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी ऐसी पहचान से जो उसे हीन भावना में डाल दे। उन्होंने कहा कि गांवों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नाम भी समाज के मूल्यों और सोच को दर्शाते हैं। इसलिए ऐसे नामों का चयन किया जाना चाहिए जो समाज में सकारात्मकता, सम्मान और समानता का संदेश दें।

समाज में सकारात्मक बदलाव का आह्वान

डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने अंत में कहा कि भारत तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है और ऐसे में सामाजिक सोच में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने कहा कि जातिगत पहचान से जुड़े पुराने प्रतीकों को बदलकर हम एक अधिक समावेशी और सम्मानजनक समाज की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।

उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार और समाज दोनों मिलकर इस दिशा में पहल करेंगे, जिससे आने वाली पीढ़ियों को एक अधिक समान और सम्मानजनक वातावरण मिल सके। डॉ. निर्मल के इस बयान के बाद सामाजिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इस मुद्दे पर अलग-अलग राय व्यक्त कर रहे हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस प्रस्ताव पर आगे क्या निर्णय लेती है।