
संकट से पुरुषार्थ उबारे, धर्मसंकट से ‘केशव’ (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Keshav Prasad Maurya Dialogue And Respect: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो संकट के समय पार्टी की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ऐसे ही नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने न केवल संगठन के लिए बल्कि सरकार के लिए भी कई बार संकटमोचक की भूमिका निभाई है। चाहे 2019 का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर विवाद हो या 2026 के माघ मेला में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा ताजा धर्म-संकट, हर बार केशव मौर्य ने राजनीतिक संतुलन, वैचारिक स्पष्टता और संवाद के जरिए भाजपा को बैकफुट से निकालने का प्रयास किया है।
साल 2019। लोकसभा चुनाव की तपिश चरम पर थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण अंतिम चरण में था। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था। भगवान विश्वनाथ के मंदिर को गंगा से सीधे जोड़ना और श्रद्धालुओं को सकरी गलियों से राहत दिलाना। लेकिन इसी बीच विपक्ष ने यह नैरेटिव गढ़ दिया कि “भाजपा सरकार प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त कर रही है।”
यह मुद्दा इतनी तेजी से फैला कि भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से लेकर स्थानीय कार्यकर्ता तक जवाब देने में असहज नजर आने लगे। कई समाचार चैनलों और अखबारों में यह प्रचारित होने लगा कि सैकड़ों मंदिर तोड़े जा रहे हैं। पार्टी फर्जी आरोपों में घिरकर बैकफुट पर चली गई।
इसी दौरान तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री और वर्तमान उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का काशी दौरा हुआ। भगवान विश्वनाथ का रुद्राभिषेक करने के बाद जब वे गंगा में बजरे पर एक टीवी कार्यक्रम के लिए जा रहे थे, तभी एक प्रमुख चैनल की टीम ने उन्हें रोक लिया। कैमरा उन स्थानों की ओर घुमाया गया जहां वर्षों से जमीन में दबे मंदिरों के अवशेष दिखाई दे रहे थे। चैनल की ओर से सीधा सवाल आया,“क्या भाजपा कॉरिडोर के नाम पर मंदिर तोड़ रही है।
यहीं से केशव मौर्य ने वह जवाब दिया, जिसने पूरी बहस की दिशा बदल दी। उन्होंने लाइव कैमरे पर कहा कि हम मंदिर बनाने वाले लोग हैं, मंदिर तोड़ने वाले नहीं।उन्होंने स्पष्ट किया कि जो मंदिर वर्षों से जमीन में दबे थे, वे अब भगवान की इच्छा से प्रकट हो रहे हैं और सरकार उनका जीर्णोद्धार कराएगी। यही एक वाक्य भाजपा के लिए संजीवनी बन गया। पार्टी कार्यकर्ता मुखर हुए, विपक्ष का नैरेटिव कमजोर पड़ा और धीरे-धीरे पूरा विवाद ठंडा हो गया।
सात साल बाद एक बार फिर भाजपा सरकार एक संवेदनशील धार्मिक मुद्दे में घिरती नजर आई। माघ मेला 2026 के दौरान मौनी अमावस्या पर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को कथित तौर पर स्नान से रोके जाने का मामला तूल पकड़ गया। शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि उन्हें पालकी से उतरने को कहा गया, और विरोध करने पर उनके समर्थकों के साथ मारपीट की गई, जिसमें 15 लोग घायल हुए। वहीं प्रशासन का पक्ष है कि बैरिकेड तोड़ने से भगदड़ की आशंका बनी थी और किसी साधु-संत का अपमान नहीं किया गया।
इस पूरे विवाद में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अचानक मुखर हिंदुत्ववादी रुख में नजर आए। उन्होंने योगी सरकार को संतों के अपमान का आरोपी ठहराया। हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह तथ्य भी चर्चा में रहा कि अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते इसी शंकराचार्य को काशी में पुलिस ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा था। इसके बावजूद अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को भाजपा के खिलाफ ब्राह्मण और संत समाज को साधने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया। साथ ही बिकरू कांड से जुड़े मामलों और ब्राह्मण विधायकों की बैठकों के जरिए भी वे सामाजिक समीकरण साधने में लगे रहे।
ऐसे माहौल में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर सुलह और संवाद का रास्ता चुना। गुरुवार को आजमगढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से संगम में स्नान करने और विरोध समाप्त करने की विनम्र अपील की। उन्होंने कहा कि मैं शंकराचार्य जी के चरणों में प्रणाम करता हूं और उनसे निवेदन करता हूं कि वे त्रिवेणी स्नान कर अपना विरोध समाप्त करें।” साथ ही मीडिया के सवालों पर उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि पूरी घटना की जांच कराई जाएगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी।
Published on:
24 Jan 2026 05:00 am
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