
Mother's Day 2022 : ये चार कविताएं हैं, पढ़ेंगे तो मां की याद आएंगी
मदर्स डे या मातृ दिवस यूपी सहित पूरे देश में मनाया जा रहा है। मां और बच्चे का रिश्ता दुनिया का सबसे अनमोल रिश्ता है। हर मां अपने बच्चे के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर देतीं हैं। बच्चे की खुशी में खुश और तकलीफों में दर्द बांटती है। मां की इसी ममता और प्यार को सम्मान देने के आठ मई को मदर्स डे मनाया जाता है। यूपी से सम्बंध रखने वाले शायर, कवि, उपन्यासकार ने अपनी कलम से मां को याद किया है। उन्हें अपना सम्मान दिया है। मुनव्वर राना, हरिवंश राय बच्चन, निदा फ़ाज़ली और आलोक श्रीवास्तव की इन कविताओं और गजलों को पढ़ें और अपनी मां को याद करें।
मदर्स डे : मुनव्वर राना के ये चंद शेर है, इनको पढ़ने के साथ आपकी मां का चेहरा आपके सामने आ जाएगा। साभार
1. चलती फिरती हुई आंखों से अज़ां देखी है
मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है मां देखी है
2. किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
3. इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
4. मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मदर्स डे : मदर्स डे पर हरिवंश राय बच्चन इस कविता को पढ़ें। साभार
आज मेरा फिरसे मुस्कुराने का मन किया,
माँ की उंगली पकड़कर घूमने जाने का मन किया,
उंगलियां पकड़कर माँ ने मेरी मुझे चलना सिखाया है,
खुद गीले में सोकर माँ ने मुझे सूखे बिस्तर पर सुलाया है,
माँ की गोद में सोने को फिर से जी चाहता है,
हाथों से माँ के खाना खाने का जी चाहता है,
लगाकर सीने से माँ ने मेरी मुझको दूध पिलाया है,
रोने और चिल्लाने पर बड़े प्यार से चुप करवया है,
मेरी तकलीफ में मुझसे ज्यादा मेरी माँ ही रोइ है,
खिला-पीला के मुझको माँ मेरी, कभी भूखे पेट भी सोइ है,
कभी खिलोने से खिलाया है, कभी आँचल में छिपाया है,
गलतियां करने पर भी माँ ने मुझे प्यार से समझाया है,
माँ के चरणों में मुझे जन्नत नज़र आती है,
लेकिन माँ मेरी मुझको हमेशा सीने से लगाती है||
मदर्स डे : बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां, निदा फ़ाज़ली का एक न भूलाने वाली कविता है। मदर्स डे इस पढ़ेंगे तो एक तस्वीर आपके सामने आ जाएगी। साभार
बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ
बाँस की खर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी थकी दो-पहरी जैसी माँ
चिड़ियों की चहकार में गूँजे राधा मोहन अली अली
मुर्ग़े की आवाज़ से बजती घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा माथा आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक एल्बम में चंचल लड़की जैसी माँ
मदर्स डे : अम्मा, आलोक श्रीवास्तव की एक शानदार रचना है। साभार
चिंतन दर्शन जीवन सर्जन
रूह नज़र पर छाई अम्मा
सारे घर का शोर शराबा
सूनापन तनहाई अम्मा
उसने खुद़ को खोकर मुझमें
एक नया आकार लिया है,
धरती अंबर आग हवा जल
जैसी ही सच्चाई अम्मा
सारे रिश्ते- जेठ दुपहरी
गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना दरिया झील समंदर
भीनी-सी पुरवाई अम्मा
घर में झीने रिश्ते मैंने
लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके चुपके कर देती थी
जाने कब तुरपाई अम्मा
बाबू जी गुज़रे, आपस में-
सब चीज़ें तक़सीम हुई तब-
मैं घर में सबसे छोटा था
मेरे हिस्से आई अम्मा ।
Published on:
08 May 2022 11:30 am
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