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‘स्त्री: देह से आगे’: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने बताया परिवार की शक्ति स्त्री में समाहित, यही वास्तविक महिला सशक्तिकरण

Gulab Kothari On Stree Deh Se Aage: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने ‘स्त्री : देह से आगे’ विषय विवेचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मां अपनी संतान को जो संस्कार देती है, वही आगे चलकर समाज और देश की दिशा तय करते हैं।
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लखनऊ

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Shaitan Prajapat

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Ritesh Singh

Aug 21, 2026

Patrika Chief Editor Gulab Kothari Speech

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (फोटो पत्रिका नेटवर्क)

बाराबंकी/लखनऊ। स्त्री केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि उसके संस्कार, चेतना और भविष्य की आधारशिला है। परिवार की वास्तविक शक्ति स्त्री में समाहित होती है और संतान को संस्कार देकर उसे मनुष्य बनाने का सबसे बड़ा दायित्व भी उसी का है। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने अपने उत्तरप्रदेश प्रवास के दौरान शुक्रवार को बाराबंकी स्थित श्रीरामस्वरूप मेमोरियल विश्वविद्यालय और लखनऊ के एसआर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशन में ‘स्त्री : देह से आगे’ विषय विवेचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह बात कही । उन्होंने कहा कि मां अपनी संतान को जो संस्कार देती है, वही आगे चलकर समाज और देश की दिशा तय करते हैं। इसलिए बेटियों को केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण की शक्ति के रूप में देखना चाहिए।

स्त्री संस्कार और राष्ट्र निर्माण की आधारशिला: गुलाब कोठारी

प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि भारतीय समाज की विशेषता रही है कि यहां जीवन को उसकी गहराई और समग्रता में समझने का प्रयास किया गया। स्त्री परिवार और आने वाली पीढ़ियों को लेकर जिस तरह के सपने देखती है, वैसी संवेदना पुरुष में सामान्यतः नहीं होती। प्रकृति ने स्त्री को ममता, प्रेम और पोषण की विशिष्ट क्षमता दी है। यही क्षमता उसे केवल एक भूमिका नहीं, बल्कि परिवार और समाज की दिशा तय करने वाली शक्ति बनाती है।

स्त्री की संवेदना और ममता ही तय करती है समाज की दिशा

उन्होंने कहा कि स्त्री केवल रूप या देह नहीं है। वह चेतना है, जो विचारों को जन्म देती है, संस्कारों को संवारती है और भविष्य को आकार देती है। उसकी शक्ति शरीर से आगे मन, बुद्धि और आत्मा की गहराइयों में निहित है। समस्या यह है कि हम स्त्री की इस व्यापक शक्ति को समझने के बजाय उसे केवल शरीर तक सीमित कर देते हैं।

स्त्री केवल देह नहीं, विचारों को जन्म देने वाली चेतना है

बाराबंकी में आयोजित कार्यक्रम में कोठारी ने कहा कि भारतीय चिंतन में पिछले जन्मों के कर्म और संस्कारों का सिद्धांत रहा है। मां को संतान की ‘त्रिकाल दर्शिका’ इसलिए कहा जा सकता है कि वह उसके व्यवहार, स्वभाव और संभावनाओं को गहराई से समझती है। संतान को इंसान बनाने की प्रक्रिया मां से शुरू होती है। समाज को केवल ‘पुरुष प्रधान’ कहकर स्त्री की भूमिका को अलग नहीं किया जा सकता। स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन आज समाज में संतुलन का अभाव दिखाई देता है।

मां संतान की 'त्रिकाल दर्शिका', पुरुष-स्त्री एक-दूसरे के पूरक

उन्होंने कहा कि शिक्षा के रूप में जो ज्ञान हमें मिलता है, वह मुख्यतः बाहरी ज्ञान है। हम बार-बार शरीर की बात करते हैं, जबकि स्त्री की वास्तविक शक्ति उसके भीतर है। दिव्यता, वात्सल्य, माधुर्य, पोषण और निर्माण की क्षमता स्त्री का स्वरूप है। वह पति को संतान में रूपांतरित करती है और गर्भ में आए जीव को संस्कार देकर मानवता से जोड़ती है। उसके भीतर आए जीव के संस्कारों और उसकी प्रकृति को समझकर उसे जीवन जीने योग्य बनाना स्त्री की बड़ी भूमिका है। पशुता से मानवता की ओर ले जाने का यह परिष्कार ही स्त्री की दिव्यता का बड़ा स्वरूप है।

बाहरी ज्ञान से परे, स्त्री की वास्तविक शक्ति उसके भीतर निहित

कोठारी ने कहा कि स्त्री मन की भाषा समझती है। अभिमन्यु का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गर्भ में रहते हुए भी बालक तक संस्कार और ज्ञान पहुंचने की भारतीय अवधारणा रही है। गर्भाधान के साथ ही मां को अपने भीतर एक नए जीवन की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है। यह विशिष्ट शक्ति प्रकृति ने स्त्री को दी है। पुरुष की शक्ति में भी स्त्री की भूमिका को हमने भुला दिया है और इसके बावजूद महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं।

मन की भाषा समझती है स्त्री, गर्भाधान से ही संस्कार की शुरुआत

उन्होंने कहा कि विवाह के बाद स्त्री केवल एक व्यक्ति की पत्नी नहीं रहती, बल्कि पूरे परिवार की शक्ति उसके साथ जुड़ती चली जाती है। परिवार के रिश्तों को जोड़ना, उन्हें पोषण देना और अगली पीढ़ी को संस्कार देना ही उसके सशक्त होने का वास्तविक स्वरूप है। महिला सशक्तिकरण को केवल आर्थिक या बाहरी स्वतंत्रता के दायरे में नहीं देखा जाना चाहिए।

विवाह के बाद पूरे परिवार को जोड़ना ही असली सशक्तिकरण

उन्होंने कहा कि यदि जीवन में सुख चाहिए तो मन को ताकतवर बनाना होगा। मन ही वास्तविक शक्ति है। मां और दादी के पास बैठकर जब व्यक्ति अपने मन की बात करता है तो वह केवल अपनी समस्या साझा नहीं करता, बल्कि जीवन को समझने की दृष्टि भी प्राप्त करता है। इससे पहले विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विजय तिवारी ने स्वागत उद्बोधन दिया। कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव प्रो. हेमेंद्र शर्मा ने आभार व्यक्त किया। वहीं लखनऊ के एसआर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूट्शंस की ओर से सोनेन्द्र तोमर ने कोठारी का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन पत्रिका के डिप्टी एडिटर हरीश पाराशर ने किया।

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