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रज़ाई से निकली रुई से महावारी का खून रोकने को मजबूर हैं यूपी की बेटियां, 150 गावों से ग्राउंड रिपोर्ट

पूर्वांचल, अवध, ब्रज, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी हर जगह यूपी की ग्रामीण महिलाएं कटे-फटे-पुराने-बेकार कपड़े, रजाई से निकली रुई से माहवारी का खून रोकने पर मजबूर हैं। उनके पास पैड खरीदने के पैसे नहीं हैं, बाजार जाने की छूट नहीं है, पुरुषों को दवा दुकानों से पैड मांगने में शर्म आती है। प‌त्रिका यूपी के 12 रिपोर्टर लगातर 10 दिनों तक यूपी के गांवों में जूझते रहे। यह रिपोर्ट 150 गांवों में लड़कियों और महिलाओं से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है।

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लखनऊ

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Janardan Pandey

Nov 04, 2023

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मेरठ में गन्ने के खेत कट चुके हैं, जहां-तहां रुई के लोथड़े किसान इकट्ठा कर रहे हैं और जला रहे हैं। उनसे बात की कि गन्ने के खेत में इतनी रुई कहां से आई? तब उन्होंने बताया, “ये गंदी रुई हैं।”

गंदी रुई? ये क्या है? इस गंदी रुई की कहानियां यूपी की बेटियां सुनाती हैं। पत्रिका यूपी के 12 रिपोर्टर्स ने 10 दिन तक यूपी के 150 गांवों की बेटियों की कहानियां सुनी हैं। अब आपके सामने ज्यों का त्यों रख रहे हैं…

मेरठ में लड़कियां पीरियड्स में पुराना तौलिया लगाती हैं, क्योंकि वो किसी से कह नहीं पातीं

मेरठ के दौराला की रजिया ने कहा, ''15 साल की उम्र में पहली बार पीरियड आए, शर्म के मारे किसी को बताया नहीं, घर में पुराना कपड़ा तलाशती रही, किसी तरह से एक पुराना तौलिया मिला तो उसको फाड़कर इस्तेमाल किया, उसके बाद से घर में जब भी कहीं कपड़ा मिलता है उसे पीरियड के दौरान इस्तेमाल के लिए रख लेते हैं।''

खरखौदा की बानू ने कहा, ''हमारे पास पैड खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। हम शुरू से पीरियड के दौरान कपड़ा इस्तेमाल करते आ रहे हैं, धोते हैं, साफ हुआ तो ठीक नहीं तो कपड़ा फेंक देते हैं। इस वक्त भी हमारे पास कपड़े के लगभग 4 टुकड़े बचे हैं।” सलारपुर की पूनम, सरूरपुर की मोहनिशा की भी यही कहानी है।

गांव नगला कबूलपुर की संजना पीरियड के दौरान पैड का उपयोग करती हैं। इसी तरह से गांव कपसाढ की सुरभि, गांव हसनपुर की ममता, गांव रछौती की सुनीता, गांव डोरली की संगीता पीरियड के दौरान हाइजीन पैड का उपयोग करती हैं।

लेकिन…

ये सभी हल्के और सस्ते पैड ही गांव की हाट बाजार से खरीदती हैं।

रिपोर्टरः कामता त्रिपाठी, मेरठ से


गोंडा में लड़कियां पीरियड्स आने पर पैड नहीं कपड़े ढूंढती हैं, क्योंकि पैसे नहीं हैं

गोंडा जिले के गांव जगदीशपुर की रजिया खातून, बसभरिया रूपा देवी, कौड़िया गांव की पूनम कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। एक बार उपयोग करने के बाद उसे फेंक देती हैं। कई महिलाओं ने नाम और पता गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि हम लोग शुरू से ही कपड़े का उपयोग करते हैं। हम लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता है बाजार से पैड खरीद कर लाया जाए।

यह पूछे जाने पर की स्वास्थ्य विभाग की तरफ से आपको पैड नहीं मिलता?

लगभग महिलाओं ने एक स्वर में कहा- गांव में कौन देने आता है।

जेठपुरवा की लक्ष्मी पीरियड के दौरान बाजार से सस्ते पैड का उपयोग करती हैं। भैरमपुर की सपना, प्रधान पुरवा की पूनम, तेलिया कोट की मालती, बेलवा भान की खुशबू, हरखापुर की ममता रानी, गुदगुदिया पुर की ललितेश, कौड़िया की सुनीता, गोसाई पुरवा की जावित्री, मनकापुर की रूपा गिरी भी बाजार कम पैसों वाला हल्का पैड इस्तेमाल करती हैं।

रिपोर्टरः महेंद्र त्रिपाठी, गोंडा से


वाराणसी में पहले लड़कियां कपड़े का टुकड़ा इस्तेमाल करती थीं, लेकिन अब खुद पैड खरीद लाती हैं

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के चौबेपुर की सिंपल शर्मा ने कहा, “मुझे कक्षा 11 में पहली बार पीरियड आया। घर आई तो मां से बताया। मां ने कपड़े के टुकड़े दिए और कहा कि इन दिनों यही इस्तेमाल करना होता है। जब मैंने उसे इस्तेमाल किया तो अजीब लगा। उसे पहनकर कहीं आने जाने में अजीब सा लगता था जैसे कोई भारी सामान रखा हो।” फिलहाल सिंपल बीए कर चुकी हैं। अब वह खुद से पैड खरीदकर लाया करती हैं।

महेशपुर की आरती, शिवपुरवा की प्रीती वर्मा, नेहा वर्मा, महेशपुर की आरती सोनकर और चौबेपुर की गीता शर्मा ने भी कमोबेश यही बताया कि पहले कपड़े का इस्तेमाल किया। अब पैड का इस्तेमाल कर रही हैं।

वाराणसी की गीता शर्मा अब 60 साल की हैं। उनका कहना है, “हमने अपनी पूरी लाइफ कपड़े का इस्तेमाल किया। इससे खुजली और कई सारी यौन से जुड़ी बीमारियां भी हुईं। इससे अपने परिवार की लड़कियों और बहुओं को बचाने के लिए खुद सबको पैड लाने को कहती हैं।”

रिपोर्टरः फैज हसनैन, वाराणसी से


लखनऊ में लड़कियों का पैड महंगा पड़ रहा है, सूती कपड़ों से ही गुजारा

लखनऊ के कठवारा गांव की सुनंदा कहती हैं, “माहवारी के दौरान बहुत परेशानी होती है। उस हालत में भी काम करना पड़ता है। यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि मंदिर नहीं छूना है। पति के साथ भी नहीं सोना होता है। कहते हैं इस हालत में सोने से पति को सफेद पानी आने लगता है। माहवारी में सूती कपड़ा इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि पैड बहुत महंगा पड़ता है।”

लखनऊ के बीकेटी की राम कुमारी को माहवारी में दूसरे कमरे में सोना होता है। मेहमान के रूप में महिलाओं के बीच में जाना जाता है। वह बताती हैं, “सूती कपड़ा हमलोग पहले से ही धोकर रखते हैं। उसी का प्रयोग करते हैं। सरकारी पैड जल्दी नहीं मिलते।”

रामपुर बेहड़ा ग्राम पंचायत के सरैया बाजार में गरीब लाल अपने परिवार के साथ रहते हैं। वह प्राइवेट शिक्षक हैं। उनके परिवार में पत्नी सुषमा बेटा राम मिलन, अनिल, प्रदीप, बेटी अंशु, अंजली हैं। अंशु बीकेटी इंटर कॉलेज में 12वीं की छात्रा और उसकी छोटी बहन अंजली कक्षा 10 की छात्रा हैं। अंजली ने बताया कि उसे जब पीरियड आते थे, तो मम्मी घर में अचार नहीं छूने देती थी, ना ही मंदिर में पूजा करने देती थी। दूर रहने के लिए हमेशा बोलती रहती थीं। अंशु ने कहा कि हमेशा हीन भावना सी मन में रहती थी। हलांकि बीते कुछ महीनों से हालात बदले हैं। अब मैं पूजा करने लगी हूं।”

अंशु और उनकी बहन अंजली पैड सबसे पहले प्रयोग किया था। गांव में रीत फाउंडेशन की दीदी आती रहती हैं। उन्होंने ही गांव की औरतों को समझाया था।

रिपोर्टरः रितेश सिंह, लखनऊ से


सहारनपुर में पीरियड्स पर बात करना ‘गलत’ है, लड़कियां-महिलाएं ‘धत्त’ कहकर मुंह फेर लेती हैं, पुरुष आंख दिखाते हैं

उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा क्षेत्र बेहट के गांव रायपुर की रहने वाली महिलाओं ने पहले तो पीरियड्स पर बात ही नहीं की। हम गांव पहुंचे तो महिलाओं के लिए इस विषय पर बात करना जैसे टैबू था। वह ‘धत्त’ बोलकर मुंह फेर ले रही थीं। विकल्प न होने पर हमने पुरुषों से बात की तो वो भी आंख दिखाने लगे और मुंह से एक शब्द न बोलते।

हालांकि इसी गांव की रीना ने हमें लगातार परेशान होते देख हिम्मत जुटाई। उनकी उम्र यही कोई 35 से 40 की बीच रही होगी। उन्होंने कहा, “देखो, बच्चों के लिए तो मंगाते हैं लेकिन खुद के लिए तो कभी मंगा नहीं सके। अब बच्चों के लिए लाते हैं तो हमें भी मिल जाते हैं।”

मुजफ्फरनगर में घर में पैड आया तो झगड़ा हो गया, सास को ये बात अच्छी नहीं लगी कि पैड खरीदकर लाए जाएं

मुजफ्फरनगर के अखलोर गांव की बबली बताती हैं, “पहली बार जब घर मे पैड मंगाए तो विवाद हुआ। सास को ये बात अच्छी नहीं लगी कि पैड खरीदकर लाया जाए। अब पति ही लेकर आते हैं, लेकिन छिपाकर।”

इसी गांव की हेमलता ने कहा, “लंबे समय तक कपड़ा इस्तेमाल किया। तब न तो कोई इसपर बात करता था ना गांव में मिलते थे। अब गांव में दुकान तो है, लेकिन पैड मंगवाने में शर्म आती है। अब किसको बोले ये ही समझ नहीं आता।”

रिपोर्टरः शिवमणि त्यागी, सहारनपुर से


प्रयागराज में पति मेडिकल स्टोर तक जाते हैं, लेकिन पैड लिए बगैर लौट आते हैं, मांगने में शर्म महसूस होती है

प्रयागराज के मेजा तहसील के नेवढ़िया गांव की रितु पांडेय कहती हैं, “मैं गांव में रहती हूं। यहां मेडिकल स्टोर या जनरल स्टोर नहीं है। जरूरत पर कपड़ों का प्रयोग करती हूं। पति से कई बार बाहर से पैड लाने के लिए भी बोला, लेकिन वह संकोच के कारण मेडिकल स्टोर पर जाकर भी खाली हाथ लौट आए। उनका कहना है कि पैड मांगने में शर्म महसूस होती है।”

प्रयागराज की बारा तहसील के लालापुर गांव की छात्रा नव्या यादव कहती हैं, “हमारे गांव में कोई लड़की पैड नहीं लगाती हैं। सब पुराने कपड़ों का ही प्रयोग करते हैं। इससे जुड़ी बात करना भी गुनाह माना जाता है। साथ ही खर्च भी बढ़ जाता है। कपड़े के प्रयोग से समस्या तो होती है, लेकिन क्या करें। विकल्प नहीं है। मेडिकल स्टोर पर जाकर पैड मांगना परिवार और गांव की नजर में बहुत गलत है।”

प्रयागराज की मेजा तहसील के छतवा-उरूवा की कंचन कहती हैं, “सेनेटरी पैड खरीदते समय यह ध्यान में रखती हूं कि वह काली पन्नी या गैर पारदर्शी झोले में हो। साथ ही दुकानदार भी इस बात को समझता है। आधुनिकता के इस युग में भी यहां झिझक बनी रहती है। अब मैं अपने गांव की प्रधान हूं। महिलाओं को इसके प्रति जागरूक कर रही हूं।”

प्रयागराज की करछना तहसील के पनासा गांव की वंदना देवी कहती हैं, “मेरी शादी को लगभग पांच साल हो गए हैं। अब मैं पैड का प्रयोग करती हूं। यह सबकुछ मेरे पति की जागरूकता के कारण संभव हुआ। 14 साल की उम्र में पहला पीरियड आया। उस दौरान मैं डरी सहमी थी। घर वालों को बता नहीं पा रही थी। कपड़े का प्रयोग करने से संक्रमण हो गया। झोलाछाप डॉक्टर से इलाज कराया। हालांकि शादी के बाद व्यवस्था बदल गई।”

प्रयागराज की करछना तहसील के भगेसर देहली की प्रिया यादव, “एक सैनिटरी पैड ब्लड, वेजाइनल म्यूकस और पीरियड्स के दौरान शरीर से निकलने वाले दूसरे वेस्ट को सोखने के लिए होता है। सेनेटरी पैड अति आवश्यक है। मैं स्वयं और अपनी बच्चियों को इसके प्रति जागरूक रखती हूं। दुकान पर खरीदने मैं स्वयं जाती हूं। शुरू में तो कुछ झिझक थी, वह अब पूरी तरह से खत्म हो गई है।”

रिपोर्टरः श्रीकृष्‍ण राय, प्रयागराज से


अल्मोड़ा में महिलाएं बेकार पड़ी रजाई रूई से माहवारी का खून रोकती हैं, क्योंकि पहाड़ी गांवों तक पैड नहीं पहुंचते

उत्तराखंड में खासतौर पर पर्वतीय जिलों के ग्रामीण इलाकों में पैड खरीदना ग्रामीण महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती है। यहां माहवारी को छुआछूत की नजर से देखा जाता है।

चम्पावत की 31 वर्षीय राधा बिष्ट ने बताया कि गांवों में पैड की व्यवस्था नहीं होती है। अधिकांश महिलाएं सूती कपड़े या बेकार पड़ी रजाई की रूई का प्रयोग माहवारी के दौरान करती हैं। उन्होंने बताया कि हमारे ब्लॉक के एक गांव में दो साल पहले एक मामला संज्ञान में आया था, जहां माहवारी के दिनों में महिलाओं को गांव के पास स्थित एक रैन बसेरे में रहने को विवश होना पड़ रहा था। उसके बाद जिलाधिकारी सहित पूरी प्रशासन की टीम ने गांव पहुंचकर जागरुकता लाने का प्रयास किया था।

अल्मोड़ा के धौलादेवी ब्लॉक के फुलई जागेश्वर की ग्राम प्रधान प्रेमा देवी ने बताया कि महिलाएं पैड के स्थान पर कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। पांच दिन तक महिला को स्पर्श भी नहीं किया जाता। उसका छुआ भोजन भी अशुद्ध माना जाता है। इस दौरान महिलाओं को घर में अलग कमरे में रहना पड़ता। यदि गलती से भी किसी व्यक्ति ने माहवारी वाली महिला या उसके कपड़े अथवा बर्तन भी छू दिए तो संबंधित व्यक्ति को शुद्ध करने के लिए गौमूत्र छिड़का जाता है। सात दिन तक महिलाएं मंदिर में नहीं जाती हैं।

भैसियाछाना की 26 वर्षीय ममता देवी ने बताया कि गांव में माहवारी के दौरान पैड खरीदना आसान नहीं है। गांवों की दुकानों में अधिकतर पुरुष दुकानदार होते हैं। उनसे पैड मांगने में परेशानी होती है।

सामेश्वर की अनुपमा ने बताया कि उन्हें कस्बे में महिला दुकानदार खोजना होता है। सल्ट की 21 वर्षीय दिव्या कॉलेज में पढ़ाई करती है। दिव्या के मुताबिक दुकान से पैड खरीदने में शर्मिंदगी महसूस होती है। दन्या निवासी आरती पांडे कहती हैं, छोटे बच्चे यदि माहवारी वाली महिला को छू कर दें तो बच्चों को गोमूत्र छिड़क कर शुद्ध किया जाता है। बताया कि गांवों में नौकरी पेशा वाले परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिलाएं तो पैड खरीद लेती हें, लेकिन अन्य महिलाओं आज भी सूती कपड़े या रूई का प्रयोग करती हैं।

रिपोर्टरः नवीन भट्ट, अल्मोड़ा से


मऊ की लड़कियां कपड़े के टुकड़े से माहवारी का खून रोकती हैं, क्योंकि मार्केट दूर और पैसे भी नहीं

“मैं पीरियड के दौरान कपड़े का उपयोग करती हूं। न इतने पैसे हैं, न तो हर बार बाजार जा सकते हैं, इसलिए कपड़े को साफ धोकर उसका इस्तेमाल कर लेते हैं। कभी-कभार मिल गया तो डिटॉल डालकर धो लेती हूं।” ये बात हमसे मऊ के खंडेरायपुर नेवादा गांव की नीतू ने कही। करीब-करीब यही बात हमसे बस्ती गांव की पूनम और सोनी ने, महराबंधा की आभा ने भी कही। सलाहबाद की श्रुति माहवारी के लिए रुई और बैंडेज का इस्तेमाल करती हैं।

लेकिन…

पलिया की सीमा, भवनाथपुर की आंचल, पलीगढ़ की सुनीता, बगली की रानी और पीजड़ा की खुशी का कहना है कि वो जब भी ऐसा करती हैं तो सिर्फ मजबूरी में। नहीं तो पैड इस्तेमाल करना बेहतर होता है। उन्हें साफ सफाई की ज्यादा चिंता नहीं करनी पड़ती।

रिपोर्टरः अभिषेक सिंह, मऊ से

झांसी में मायके रहने दौरान लड़कियां खुद पैड खरीद लेती हैं, लेकिन शादी के बाद बाजार नहीं जा पातीं

झांसी के काशीपुरा गांव की सरोज कहती हैं, “जब मैं मायके में थी तब पैड इस्तेमाल करती थी, लेकिन शादी के बाद से कपड़ा इस्तेमाल कर रही हूं। कभी-कभी तो उसी कपड़े को धो कर दोबारा से इस्तेमाल करना पड़ता है। मऊरानीपुर की रहने वाली रिहाना कहती है कि हमारे यहां सभी कपड़े का इस्तेमाल करते हैं। कई बार इंफेक्शन हो जाता है। दवा भी करवानी पड़ती है।”

झांसी की जरहाकलां ग्राम प्रधान संगीता यादव कहती हैं, “हमारी ग्राम पंचायत में जो महिलाएं जागरूक हो चुकी हैं, वे सभी सेनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं। ऐसा करने वाली ज्यादातर 13 से लेकर 35 साल की उम्र की हैं। इसके बाद कुछ ऐसी महिलाएं भी है जिनकी उम्र 42 से 43 वर्ष हो चुकी है लेकिन इससे ऊपर की उम्र वाली आज भी कपड़े का ही यूज करती हैं। फिलहाल अब जागरुकता बढ़ रही है।

खरैला गांव की रहने वालीं मीनाक्षी देवी कहती हैं, “जब मैं मायके में थी तब से ही पैड इस्तेमाल कर रही हूं। शादी के बाद मैंने अपनी जेठानी को भी सेनेटरी पैड इस्तेमाल करने की सलाह दी। अब वे भी करती हैं।”

रिपोर्टरः राम नरेश यादव, झांसी से

अयोध्या की लड़कियां माहवारी में कपड़ा लगाने पर मजबूर, क्योंकि पैसे नहीं है

अयोध्या के बीकापुर तहसील के गांव देवसियापारा की गुलाबा से जब इस बारे में बात करने की कोशिश की तो पहले तो वे कुछ कहने को तैयार नहीं हुईं, पर हमारे साथ गईं आशा बहू किरण ने जब उन्हें समझाया तो उन्होंने काफी संकुचित भाव से कहा, “वे चाहती तो हैं कि पीरियड के दौरान उनकी बेटी और बहू सेनेटरी पैड का इस्तेमाल करें। पर चाहकर भी इस कार्य मे गरीबी आड़े आ जाती है। इसलिए कपड़ा ही एकमात्र सहारा है।”

बछईपुर की एमए पास निधि बताती हैं कि उनके परिवार में सभी महिलाएं सेनेटरी पैड का ही इस्तेमाल करती हैं, क्योंकि कुछ पैसे बचने के चक्कर में कभी कभार हमें भारी नुकसान उठाना पड़ जाता है। धेनुवावां गांव में भी गरीब घरों की महिलाएं कपड़ा ही इस्तेमाल करती हैं। जागरूकता की बात करें तो इसी से समझा जा सकता है कि कुछ गांवों में इस मुद्दे पर महिलाएं बात करने तक को तैयार नहीं हुईं।

रिपोर्टरः राहुल मिश्रा, अयोध्या से

मुरादाबाद सिटी में महिलाएं पैड ला रही हैं, लेकिन गांव में पैसे चलते कपड़े सुखाकर कर रही हैं इस्तेमाल

मुरादाबाद के समाथल गांव की नेहा प्रजापति ने बताया कि पीरियड्स के दौरान वह अच्छी क्वालिटी का पैड इस्तेमाल करती हैं हालांकि, मेरी जानकारी में बहुत सी महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती हैं जबकि, कपड़े के इस्तेमाल से बीमारियों का खतरा बना रहता है।

उनका कहना है कि एक परिवार में पांच महिलाएं हैं और अगर वह पैड का इस्तेमाल करें तो महीने के हिसाब से उसकी रकम अधिक होने के कारण बहुत सी महिलाएं आज भी गांव में कपड़े का इस्तेमाल कर रही हैं।

रिपोर्टरः मोहम्मद दानिश, मुरादाबाद से

उन्नाव में महिलाएं एक ही सैनिटरी पैड कई बार इस्तेमाल करती हैं, क्योंकि खरीदने में शर्म आती है

उन्नाव के आदर्श नगर निवासी नीलम सिंह कहती हैं, “गांव में अभी भी एक ही सेनेटरी पैड का कई बार इस्तेमाल होता है। कपड़े का भी प्रयोग किया जाता है। क्योंकि परिवार के लोग कई बार कहने पर एक बार लाते हैं। विवाहित या फिर अविवाहित महिला हो सभी में इंफेक्शन होता है। इंफेक्शन का असर शरीर के अंगों पर भी पड़ता है।”

वह कहती हैं, “मेरी एक बेटी है। हम अपनी बच्चियों से खुलकर बात करते हैं। क्योंकि आगे चलकर उन्हें भी मां बनना है। तब उन्हें काफी परेशानी होती है। इसलिए बच्चियों को भी जागरूक करना बहुत जरूरी है।”

रिपोर्टरः नरेंद्र अवस्‍थी, उन्नाव से


पहले सैनिटरी पैड पर सरकारी रुख, प्रधानमंत्री जन आरोग्य केंद्र पर मिलते हैं 1 रुपए में पैड

सरकार ने यूपी में बड़ी संख्या में जन औषधि या जन आरोग्य केंद्र खोले हुए हैं। यहां पर 1 रुपए में पैड मिलते हैं। हालांकि इनकी संख्या अभी गांवों की तुलना में 3 गुने या इससे ज्यादा कम है।




























































जिलेजन औषधि केंद्रगांव
लखनऊ93809
प्रयागराज263084
वाराणसी621341
मेरठ84660
सहारनपुर391577
झांसी20821
गोंडा171821
अयोध्या201267
मुरादाबाद241166
अल्मोड़ा111808

सोर्स (जन औषधि केंद्र): http://janaushadhi.gov.in/KendraDetails.aspx

सोर्स (गांव): https://www.viewvillage.in/

अब बाजार में सैनिटरी पैड बेचने वाली कंपनियों की कीमतें





































सैनिटरी पैड बेचने वाली कंपनियांप्रति पैक कीमत
Whisper₹30
Stayfree₹35
Carefree₹70
Paree₹32
Sofy₹29
Nine₹40
Nua₹166

*औसतन एक पैक में 6 से 10 सैनिटरी पैड होते हैं


यूपी की 70% लड़कियों ने कहा- सैनिटरी पैड खरीदने में सक्षम नहीं

अमरीकी सरकार से सहायता प्राप्त नेशनल सेंटर फॉर बायोटे‌क्नॉली इंफॉर्मेशन के https://www.ncbi.nlm.nih.gov/ रिसर्च पेपर के मुताबिक, यूपी में 70% लड़कियों का कहना है कि उनके परिवार सैनिटरी पैड्स को खरीदने में सक्षम नहीं हैं, और 88% सैनिटरी पैड्स के रूप में घरेलू वस्तुओं जैसे कपड़ा या घास का इस्तेमाल करते हैं।

भारत में सैनिटरी पैड का आविष्कार किसने किया?

तमिलनाडु के मुरुगनाथम अरुणाचलम को भारत का पैडमैन कहते हैं। इन्होंने भारत में 1998 में पैड बनाकर अपनी पत्नी को देना शुरू किया था। साल 2015-16 में सरकार के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (NFHS) प्रकाशित हुआ था। इसमें 15-24 साल की 42% लड़कियां सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं। अगर इन आंकड़ों में 24 साल से बड़ी उम्र की महिलाओं की संख्या जोड़ दी जाए तो पीरियड्स के दौरान पैड्स इस्तेमाल करने का प्रतिशत और बढ़ जाएगा। भारत में करीब 35.5 करोड़ महिलाएं और लड़कियां हैं जिन्हें पीरियड्स होता है।

लड़कों के लिए बनाया गया था सैनिटरी पैड्स

सैनिटरी पैड्स को फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के समय बनाया गया था। उस समय इसका इस्तेमाल लड़के किया करते थे। https://www.postoast.com/ की रिपोर्ट के अनुसार, फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में जब सैनिकों को गोलियां लगती थीं, तो उनका खून रोकने के लिए इस सैनिटरी पैड्स का यूज किया जाता था। इसे पहली बार बेंजमिन फ्रेंकलिन ने बनाया था।

लड़कियों तक कैसे पहुंचा सैनिटरी पैड्स?

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दरअसल, फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के समय जब सैनिकों को गोलियां लगतीं तो उनके खून को रोकने के लिए इस पैड का यूज किया जाता था। इसी दौरान फ्रांस में सैनिकों का इलाज करने वाली कुछ नर्सों को समझ आया कि जब ये शरीर से निकलने वाला खून सोख सकता है तो फिर पीरियड के दौरान महिलाओं के शरीर से निकलने वाला खून भी सोख लेगा। और फिर यहीं से सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल महिलाओं के लिए शुरू हुआ।

पूरी दुनिया में कैसे फैला सैनिटरी पैड का इस्तेमाल

फर्स्ट वर्ल्ड वॉर की घटना के बाद जब इसका चलन धीरे-धीरे बढ़ने लगा तो साल 1888 में कॉटेक्स (Kotex) नाम की एक कंपनी ने सैनिटरी टावल्स फॉर लेडीज 'Sanitary Towels for Ladies' नाम से एक प्रोडक्ट निकाला जिसका इस्तेमाल महिलाएं पीरियड के दौरान करती थीं। हालांकि, इससे पहले जॉनसन एंड जॉनसन ने 'लिस्टर्स टावल्स' नाम से डिस्पोजबल नैपकिन्स बनाना शुरू कर दिया था, लेकिन ये ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ था।

यूपी, भारत और दुनिया से जुड़े आंकड़े और जानकारी संजना सिंह ने संकलित की है।