
अब सिर्फ गृहिणी नहीं, राष्ट्र निर्माता कहलाएंगी महिलाएं; सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुशी (फोटो सोर्स : भाषा संवाद WhatsApp News Group)
Supreme Court Homemakers Women Recognition: देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा गृहणियों के योगदान को ‘राष्ट्र निर्माण’ का महत्वपूर्ण आधार मानते हुए उन्हें ‘नेशन बिल्डर’ यानी राष्ट्र निर्माता की संज्ञा दिए जाने के बाद देशभर में इस फैसले की चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का स्वागत किया है। महिलाओं का कहना है कि वर्षों से घर और परिवार के लिए किए जा रहे उनके श्रम को पहली बार इतनी स्पष्ट और सम्मानजनक मान्यता मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि गृहणियां केवल घर संभालने का कार्य नहीं करतीं, बल्कि वे समाज और राष्ट्र की नींव को मजबूत करने का काम करती हैं। अदालत ने माना कि घरेलू कार्यों का महत्वपूर्ण आर्थिक मूल्य है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता रहा है। न्यायालय ने गृहणियों द्वारा किए जाने वाले घरेलू कार्यों के मूल्यांकन के संदर्भ में प्रतिमाह 30 हजार रुपये का उल्लेख भी किया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति कोटिस्वर सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान घरेलू कार्यों की आर्थिक और सामाजिक महत्ता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। अदालत ने कहा कि घर के भीतर किए जाने वाले ऐसे कार्य जिनके लिए कोई प्रत्यक्ष भुगतान नहीं होता, उनका महत्व कम नहीं हो जाता। वास्तव में ये कार्य परिवार और समाज की स्थिरता के लिए बेहद आवश्यक हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि समय आ गया है जब ‘होममेकर’ शब्द को केवल घर तक सीमित भूमिका के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले व्यक्ति के रूप में सम्मान दिया जाए। अदालत की इस टिप्पणी को महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद लखनऊ की कई महिलाओं ने खुशी व्यक्त की। समर्थ नारी समर्थ भारत की राष्ट्रीय अध्यक्ष नीरा वर्षा सिन्हा जो राष्ट्रीय स्तर की महिला संगठन चलाती और साथ ही एक कुशल गृहिणी भी हैं उनका कहना है कि अक्सर उनके कार्यों को परिवार का सामान्य दायित्व मान लिया जाता है, जबकि घर चलाने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
इंदिरा नगर निवासी एक कुसुम श्रीवास्तव (गृहिणी )ने कहा कि सुबह से रात तक परिवार की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की सेवा और घर की पूरी व्यवस्था संभालना आसान काम नहीं है। उन्होंने कहा कि अदालत ने गृहणियों की मेहनत और त्याग को जो सम्मान दिया है, वह हर महिला के लिए गर्व की बात है। वहीं गोमती नगर की निवासी स्वेता महिला ने कहा कि यह फैसला समाज की सोच बदलने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं का घरेलू श्रम अदृश्य जरूर होता है, लेकिन उसका महत्व किसी भी पेशेवर कार्य से कम नहीं है।
लखनऊ सिविल कोर्ट की वकील प्रियंका शर्मा का मानना है कि यदि एक गृहिणी द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों को अलग-अलग व्यक्तियों से कराया जाए तो इसके लिए बड़ी आर्थिक लागत वहन करनी पड़ेगी। खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, घर की सफाई, बुजुर्गों की सेवा, घरेलू प्रबंधन और पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन ऐसे कार्य हैं जो प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक गतिविधि का हिस्सा भले न दिखें, लेकिन उनका मूल्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा कि घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्य को स्वीकार करना जरूरी है। अदालत की यह टिप्पणी उन लाखों महिलाओं के योगदान को पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो वर्षों से बिना किसी वेतन या औपचारिक मान्यता के परिवारों को संभाल रही हैं।
सामाजिक संगठन से जुड़ी रुपाली दास का कहना है कि भारतीय समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि घरेलू कार्य महिलाओं का स्वाभाविक कर्तव्य है। इसी कारण इन कार्यों को आर्थिक दृष्टि से महत्व नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इस सोच को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। उन्होंने कहा है कि जब समाज घरेलू कार्यों के महत्व को स्वीकार करेगा, तब महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता की भावना भी मजबूत होगी। इससे नई पीढ़ी में भी महिलाओं के योगदान के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होगा।
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि मजबूत परिवार ही मजबूत समाज और राष्ट्र का आधार होते हैं। बच्चों के संस्कार, शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण में गृहणियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिवार की एकजुटता और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में भी महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि अदालत ने गृहणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ की संज्ञा दी। न्यायालय का मानना है कि जो महिलाएं घरों में रहकर अगली पीढ़ी का निर्माण करती हैं, वे प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी निभाती हैं।
लखनऊ की महिलाओं का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल सम्मान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाने वाली है। कई महिलाओं ने कहा कि समाज में अक्सर नौकरी करने वाली और घर संभालने वाली महिलाओं की तुलना की जाती है, जबकि दोनों की भूमिकाएं अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। महिलाओं ने उम्मीद जताई कि अदालत की इस टिप्पणी के बाद घरेलू कार्यों को लेकर लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव आएगा और गृहणियों के योगदान को अधिक सम्मान मिलेगा।
वकील कामना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में घरेलू श्रम के मूल्यांकन और महिलाओं से जुड़े विभिन्न कानूनी मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकती है। यह निर्णय महिलाओं के सम्मान, समानता और सामाजिक पहचान के मुद्दे पर नई बहस को जन्म दे सकता है।
फिलहाल, देशभर की तरह लखनऊ में भी महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि वर्षों से घर की चारदीवारी के भीतर किए जा रहे श्रम को जो सम्मान सुप्रीम कोर्ट ने दिया है, वह हर गृहिणी के लिए गर्व और आत्मसम्मान का विषय है। अदालत का यह संदेश स्पष्ट है कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े पदों और संस्थाओं के माध्यम से नहीं होता, बल्कि उन लाखों महिलाओं के समर्पण से भी होता है जो अपने परिवार और समाज को मजबूत बनाने में निरंतर योगदान देती हैं।
Updated on:
11 Jun 2026, 5:18 PM IST
Published on:
11 Jun 2026, 5:18 PM IST
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