
धारा 377 के खिलाफ इन लखनवाइट्स ने भी लड़ी है जंग, अब हैं बेहद खुश
लखनऊ. धारा 377 को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एलजीबीटी ग्रुप बेहद खुश हैं। इस खुशी के पीछे वो संघर्ष भी है जो ये पिछले कई साल से ये लोग करते आ रहे थे। इस हक की लड़ाई में लखनऊ की भूमिका भी अहम रही है। दरअसल लखनऊ में एनजीओ चलाने वाले आरिफ (47) धारा 377 के तहत जुलाई 2001 में गिरफ्तार किए गए थे। उन्हें 47 दिन की जेल भी हुई थी। इसके बाद से वह लगातार इस एक्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। वह इस केस में याचिकाकर्ता भी थे। उन्होंने बताया कि कई साल के संघर्ष के बाद ये इंसाफ मिला है।
साल 2001 में आरिफ को डालीबाग स्थित अपने ऑफिस से गिरफ्तार कर लिया गया था। आरिफ के मुताबिक, उन्हें और उनके साथियों को जीप में लादकर थाने ले जाया गया लॉकअप में बंदकर पीटने के बाद जेल में भी बेरहमी से पीटा गया। दस दिनों तक पानी तक नहीं दिया गया। जेल में एक भला कैदी पानी पिला देता था। जेल में लगातार धमकी मिलती रही। समलैंगिक होने के जुर्म में जेल में बिताए 47 दिनों का दर्द कभी भूल ही नहीं सकता।फैसले के वक्त दिल्ली में मौजूद केस के मुख्य याचिकाकर्ता आरिफ जाफर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताते हुए कहा कि यह एक लम्बी लड़ाई थी। इसमें बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज संतोष है कि समलैंगिक पर फैसला करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह कोई गुनाह नहीं है। समलैंगिकों को भी सम्मान के साथ जीने का पूरा हक है।
नाज फाउंडेशन के को फाउंडर आरिफ के मुताबिक प्रदेश में एलजीबीटी कम्युनिटी के लिए काम करने वाले भरोसा ट्रस्ट से करीब 17 हजार लोग जुड़े हैं। लखनऊ में एलजीबीटी कम्युनिटी को पहचान दिलवाने के लिए फाउंडेशन की नींव रखने वाले आरिफ के अनुसार 1991 से हक की जंग शुरू की थी। इसकी नींव लंदन में पड़ी थी। लंदन से लखनऊ तक ये संघर्ष जारी रहा। आरिफ का ये भी कहना है कि देश को 1947 में आजादी मिली थी, लेकिन हमारी कम्युनिटी को आजादी अब मिली है।
इन्होंने भी ली राहत की सांस
एलजीबीटी दरवेश सिहं यदुवेंद्र के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत महत्वपूर्ण है। ये हर नागरिक की जीत है। सुप्रीम कोर्ट ने एक नई उम्मीद है। जब हम समानता की बात करते हैं तो हर नागरिक को ये मिलना चाहिए। वहीं राजधानी निवासी तनजील अहमद के अनुसार मेरे समलैंगिक होने का पता चलने पर परिवार के लोग काफी नाराज थे। पुलिस केस करने तक की धमकी दी जाती थी। हालांकि मैं अब भी परिवार के साथ ही हूं। अब यह अपराध की श्रेणी में नहीं है। वहीं राजधानी की रहने वाली अशीद ने कहा कि बहुत पहले ये फैसला आना चाहिए था। हम बेहद खुश हैं। लोगों की मानसिकता तो हम नहीं बदल सकेंगे लेकिन ये हमारी बहुत बड़ी जीत हुई है। धीरे-धीरे आम लोग इसे समझेंगे।
Published on:
07 Sept 2018 02:57 pm
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