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Supreme Court: मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: महिलाओं के साथ भेदभाव के आरोपों पर केंद्र को नोटिस

Supreme Court Shariat Law: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार में भेदभाव के आरोपों पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, 1937 के शरीयत कानून के प्रावधानों को चुनौती दी गई।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Apr 16, 2026

शरीयत उत्तराधिकार कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त   (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group) 

शरीयत उत्तराधिकार कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त   (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group) 

Supreme Court Questions Shariat Inheritance Law:  सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। यह मामला 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन अधिनियम के उन प्रावधानों को चुनौती देता है, जिन्हें याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताया है। अदालत के इस कदम को देश में लैंगिक समानता और व्यक्तिगत कानूनों की समीक्षा के संदर्भ में एक अहम मोड़ माना जा रहा है।

जनहित याचिका में उठाए गए गंभीर सवाल

यह जनहित याचिका लखनऊ की अधिवक्ता पौलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद द्वारा ‘न्याया नारी फाउंडेशन’ की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े नियम महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार नहीं करते और उन्हें पुरुषों की तुलना में कम अधिकार प्रदान करते हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि यह प्रावधान भारतीय संविधान के मूल अधिकारों, विशेष रूप से समानता के अधिकार, का उल्लंघन करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मांगा जवाब

इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका में उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार से जवाब तलब किया और नोटिस जारी करने का आदेश दिया। यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है, जो नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए याचिका दायर करने का अधिकार देता है।

“आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं” - याचिकाकर्ता

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता निहाल अहमद ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें पेश करते हुए कहा कि उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े ये प्रावधान इस्लाम की “आवश्यक धार्मिक प्रथाओं” का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए इन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

प्रशांत भूषण ने अदालत में कहा कि “यह पूरी तरह असंगत है कि महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा दिया जाए। यह स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है और इसे किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता।”

वसीयत संबंधी प्रावधान भी विवाद में

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई (1/3) हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी पूरी संपत्ति पर स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकता। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों को सीमित करता है, जो आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।

लैंगिक समानता का मुद्दा केंद्र में

यह मामला केवल कानूनी विवाद नहीं, बल्कि समाज में लैंगिक समानता के व्यापक प्रश्न से भी जुड़ा हुआ है। लंबे समय से यह बहस चल रही है कि क्या व्यक्तिगत कानूनों को संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप करता है, तो यह महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

केंद्र सरकार की भूमिका अहम

अब इस मामले में केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह व्यक्तिगत कानूनों और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बनाएगी। केंद्र का पक्ष आने के बाद ही अदालत इस मामले में आगे की सुनवाई और संभावित निर्णय की दिशा तय करेगी।

सामाजिक और कानूनी बहस तेज

सुप्रीम कोर्ट के इस नोटिस के बाद देशभर में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। एक ओर जहां महिला अधिकारों के समर्थक इसे सकारात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं कुछ वर्ग इसे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता है और यदि हां, तो किस हद तक।