
Mission 2027 Akhilesh Yadav: अखिलेश यादव के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के विजयी रथ को रोकना। 2017 में भाजपा ने अखिलेश को सत्ता से बाहर किया था और तब से अब तक वह दोबारा सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का रास्ता नहीं खोज पाए हैं।
हालांकि, इस बार वह भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी से रास्ता बनाने की कोशिश में जरूर नजर या रहे हैं। मुस्लिम-यादव समुदाय अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक हैं। जबकि ब्राह्मण समुदाय के बारे में यह माना जाता है कि उसका वोट कमल के निशान पर ही जाता है। अब अखिलेश की कोशिश ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की है।
समाजवादी पार्टी यानी सपा ने 17 जून को ब्राह्मण समुदाय की एक विशेष बैठक बुलाई थी। कहने को तो यह बैठक 5 अगस्त की जनेश्वर मिश्र जयंती की तैयारियों पर चर्चा के लिए थी, लेकिन इसका असल मकसद ब्राह्मण वर्ग को लुभाना था।
यूपी की कुल आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी करीब 10 से 15% है। ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मण राज्य के 403 विधानसभा क्षेत्रों में से 100 में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण मतदाताओं ने BJP का साथ दिया, जिससे पार्टी की सत्ता में वापसी हुई। अखिलेश इस कैलकुलेशन को अच्छे से समझते हैं, इसलिए उन्होंने अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़कर ब्राह्मणों पर डोरे डालना शुरू कर दिया है।
समाजवादी पार्टी नेता ब्राह्मण समाज को यह समझाने में लगे हैं कि सपा ने ऐतिहासिक रूप से सोशलिस्ट आंदोलन में ब्राह्मणों को एक अहम स्थान दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्रा इसका उदाहरण हैं। अखिलेश यादव के कार्यकाल में ब्राह्मण नेताओं को सरकार, पार्टी संगठन और प्रशासन में बेहतर प्रतिनिधित्व का मौका दिया गया था और अगर राज्य में फिर से सपा की सरकार बनती है, तो ब्राह्मणों का पहले जैसा ख्याल रखा जाएगा।
मालूम ही कि कुछ मुद्दों पर ब्राह्मण समाज योगी सरकार से नाराज चल रहा है और कई मौकों पर यह नाराजगी सामने भी आ चुकी है। इसमें मुख्यतौर पर शंकराचार्य विवाद और UGC के नए नियम शामिल हैं। प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार पर ब्राह्मणों में गहरी नाराजगी जताई थी। समय के साथ इस नाराजगी में भले ही कमी आई हो, लेकिन वो पूरी तरह दूर नहीं हुई है। अखिलेश यादव इस नाराजगी को अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं।
बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज को बीजेपी से दूर करने में भले अखिलेश को सफलता न मिले, लेकिन अगर वह ब्राह्मणों के एक वर्ग को भी अपने खेमे में ला पाते हैं, तो चुनावी परिणाम बदल सकते हैं। यूपी में ब्राह्मण असरदार जाति समूहों में शामिल हैं। यूपी में 10-15% ब्राह्मण हैं। हालांकि, पूर्वांचल में इनकी तादाद 20% प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। जबकि ठाकुर या राजपूत करीब 13% हैं। राज्य में मुस्लिम मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं। खासकर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड और कुछ अन्य क्षेत्रों में इनकी संख्या 30-50% तक है। पिछले कुछ सालों में मुस्लिम मतदाताओं की सोच में भी बदलाव आया है, लेकिन फिर भी उनका झुकाव सपा और कांग्रेस की तरफ अधिक है।
ऐसे में अगर मुस्लिम और यादव के साथ अखिलेश को ब्राह्मणों का भी साथ मिल जाता है, तो चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। वैसे, कुछ सियासी पंडितों का यह भी कहना है कि ब्राह्मण समाज में योगी सरकार या कहें कि भाजपा के प्रति नाराजगी इतनी भी नहीं है कि वे सपा की ‘साइकिल’ पर सवार हो जाएँ। उनकी नजर में यह नाराजगी से ज्यादा रूठना है। इसके अलावा, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में काफी काम हुए हैं। विकास के मामले में यूपी कई दूसरे राज्यों से तेज दौड़ रहा है। उनके मुताबिक, भले ही उत्तर प्रदेश के चुनाव में जाति देखी जाती हो, लेकिन आजकल मतदाता विकास के पैमाने पर भी पार्टियों को तोलता है और उसमें बीजेपी का पलड़ा भारी है।
साल 2007 में मायावती ने भी इसी तरह ब्राह्मण को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी और वह सफल भी रहीं। अब देखने वाली बात होगी कि क्या अखिलेश यादव भी वैसा ही कमाल दिखा पाते हैं?
Updated on:
19 Jun 2026 05:58 pm
Published on:
19 Jun 2026 05:24 pm
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