
सपा बनाम भाजपा : बूथ पर मुकाबला (फोटो एआई)
UP Elections 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की रणभेरी से पहले ही राजनीतिक दलों ने वोटों का हिसाब-किताब शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस बार लोकप्रिय नारों से आगे बढ़कर सीधे बूथ और परिवार तक पहुंचाना शुरू कर दिया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रविवार को पार्टी बैठक में सभी कार्यकर्ताओं को विधानसभा क्षेत्र में 27 हजार वोट बढ़ाने का लक्ष्य सौंप दिया। इस तरह उन्होंने 27 बनाम 27 की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। आखिलेश का मानना है कि पार्टी ऐसे परिवारों तक पहुंचे, जिन्होंने बीते साढ़े नौ साल में अन्याय या अत्याचार का सामना किया। उन्हें सपा से जोड़ा जाए। नए जुड़ने वाले मतदाताओं की मदद से एनडीए के करीब 27 हजार वोट कम किए जा सकते हैं। इन्हें सपा से जोड़कर मतदान की ताकत दोगुनी हो जाएगी। अखिलेश ने इसके लिए कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर लोगों की समस्याएं सुनने और उनसे सीधे संवाद करने का निर्देश दिया है।
यह घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सपा की रणनीति अब केवल जातीय समीकरण या बड़ी जनसभाओं तक सीमित नहीं रही। पार्टी बूथ स्तर पर मतदाता जोड़ने, स्थानीय असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने और डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रही है। सपा इससे पहले अगस्त में भी पार्टी के बूथ एजेंटों को प्रत्येक बूथ पर कम से कम पांच नए मतदाता जोड़ने का लक्ष्य दे चुकी है।
विधानसभा चुनाव में 27 हजार वोट कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। किसी सीट पर यह जीत-हार का अंतर बदल सकता है लेकिन सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में समान संख्या में वोट बढ़ाने का लक्ष्य अपने आप में एक राजनीतिक लक्ष्य है।
पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक कई सीटों पर भाजपा और सपा के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा। उदाहरण के तौर पर सहारनपुर जिले की नकुड़ सीट पर भाजपा महज 315 वोट के अंतर से जीती। ऐसे ही सहारनपुर नगर में अंतर 7 हजार 434 और देवबंद में 7 हजार 104 वोट का रहा। ऐसी भी कई सीट हैं, जहां दोनों दलों के बीच जीत का अंतर काफी बड़ा रहा।
इससे स्पष्ट है कि 27 हजार का लक्ष्य हर सीट पर एक जैसा परिणाम नहीं देगा। असली सवाल यह है कि सपा किन सामाजिक समूहों और किन स्थानीय मुद्दों की मदद से यह अतिरिक्त वोट जुटाने की रणनीति बनाएगी। साथ ही कितनी और किस विधानसभा में इसका कितना असर संभव होगा।
अखिलेश की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मतदाता के घर तक पहुंचना है। पार्टी कार्यकर्ताओं को लोगों की समस्याएं सुनने और अन्याय-अत्याचार से प्रभावित परिवारों को जोड़ने की कोशिश है। यह रणनीति सपा के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि आगामी विस चुनाव में सिर्फ अपने परंपरागत मतदाताओं को साधने से नहीं जीता जा सकता, बल्कि नए वोटर्स को जोड़कर ही रास्ता मिलना संभव है। ताजा लोकसभा चुनाव में सपा ने यूपी में अपनी जड़ों की मजबूती को दर्शा दिया है। अब उस बढ़त को विधानसभा स्तर पर स्थाई रखना ही पार्टी की चुनौती है।
सपा अगस्त से ही बूथ स्तर पर नए मतदाता जोड़ने में जुटी है। पार्टी ने प्रत्येक बूथ पर पांच नए मतदाता जोड़ने का लक्ष्य रखा था। अत: यह स्पष्ट है कि 27 हजार का लक्ष्य अचानक सामने नहीं आया बल्कि बूथ स्तर पर मतदाता विस्तार की पहले से चल रही कोशिश को बड़े राजनीतिक लक्ष्य में बदला गया है।
सपा की राजनीति का एक दूसरा आधार पीडीए-पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ है। सपा ने रविवार की बैठक में पीडीए की सातवीं ऑडिट रिपोर्ट भी जारी की।
अखिलेश ने किसानों की आय, डीजल-पेट्रोल, खाद, कीटनाशक और डीएपी की लागत और फसलों के लाभकारी मूल्य को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों और आरक्षण से जुड़े मुद्दे भी उठाए। अयोध्या में जमीन से जुड़े कथित मामलों और अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता को लेकर भी उन्होंने सरकार पर आरोप लगाए।
अखिलेश ने बीते नौ साल के दौरान प्रदेश में 151 से अधिक आंबेडकर प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाने का भी गंभीर आरोप लगाया। साथ ही ऐसे 14 मामलों में कार्रवाई होने का भी दावा किया।
सपा के 27 हजार वोट के लक्ष्य के साथ ही भाजपा ने भी अपनी संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर और अन्य जिलों में पार्टी पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर चुके हैं।
भाजपा का फोकस भी बूथ संगठन को सक्रिय करने, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय बढ़ाने और युवा एवं महिलाओं तक पहुंचने का है। पार्टी नेता सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को मतदाताओं तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं।
भाजपा ने बैठकों में पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वोटों के लिहाज से पिछड़े क्षेत्रों की समीक्षा भी शुरू कर दी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश को खास तौर पर चुनौती वाले क्षेत्र के तौर पर चिह्नित किया गया है। पार्टी नेतृत्व उन सीटों पर भी ध्यान दे रहा है जहां पिछले विस चुनाव में हार मिली या जीत का अंतर कम रहा।
अत: भाजपा और सपा की चुनावी तस्वीर में दिलचस्प समानता दिखाई दे रही है, सपा 27 हजार नए वोट जोड़ने के लिए घर-घर पहुंचने में जुटी है तो वहीं भाजपा भी बूथ संगठन को सक्रिय कर घरों तक पहुंच बढ़ाने में सक्रिय है।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीती थीं, जबकि सपा 111 सीटों पर रही थी। इन आंकड़ों को आधार बनाया जाए तो सपा के सामने चुनौती केवल भाजपा के वोट घटाने की नहीं बल्कि उन सीटों पर अपने वोट बढ़ाने की है, जहां दोनों दलों के बीच मुकाबला कड़ा है।
यही वजह है कि 27 हजार का लक्ष्य चुनावी नारे से ज्यादा संगठन की परीक्षा बनता दिख रहा है। यदि किसी विधानसभा में पहले से मजबूत सपा संगठन है तो वहां 27 हजार अतिरिक्त वोट जुटाने की रणनीति अलग होगी और जहां पार्टी का संगठन कमजोर है वहां मतदाता संपर्क, स्थानीय नेतृत्व और बूथ प्रबंधन की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।
Updated on:
20 Sept 2026 08:29 pm
Published on:
20 Sept 2026 08:27 pm
