
इलाहाबाद हाईकोर्ट (File Photo)
UP Panchayat Election: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में हो रही देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि तय समय के भीतर पंचायत चुनाव कराना सरकार की जिम्मेदारी है, इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने बताया कि राज्य सरकार के अनुसार यह समयसीमा नवंबर 2026 में पूरी हो जाएगी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव में देरी से जुड़े रिकॉर्ड तलब किए हैं। अदालत अब यह पता लगाएगी कि देरी किसी मजबूरी के कारण से हुई या सरकार की लापरवाही से हुई। इस मामले में अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी।
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की पीठ ने एसके शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत ने राज्य सरकार से रिकॉर्ड इसलिए तलब किए हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि चुनाव समय पर न कराने के पीछे सरकार के नियंत्रण से बाहर की कोई स्थिति थी या फिर सरकार अपने संवैधानिक दायित्व को समय पर पूरा करने में विफल रही। कोर्ट ने बताया कि इस संबंध में कुछ डिजिटल रिकॉर्ड (ई-अभिलेख) पेश किए गए हैं, जिनका अगली सुनवाई पर दोबारा परीक्षण किया जाएगा। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को सलाह दी कि वह इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के सुरेश महाजन फैसले का भी अध्ययन करे।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भविष्य में पंचायत चुनाव की पूरी प्रक्रिया संबंधित पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम दो साल पहले शुरू कर दी जानी चाहिए। तभी संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार पांच साल की अवधि के भीतर समय पर चुनाव कराना संभव होगा। पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में सरकार ने मई 2025 से प्रक्रिया शुरू कर दी थी, लेकिन इसके बावजूद पंचायत चुनाव अब तक नहीं हो सके। पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित एक अन्य जनहित याचिका में राज्य सरकार ने अपने जवाब में पंचायत चुनाव में देरी के पीछे दो प्रमुख कारण बताए हैं।
सरकार के अनुसार पहला कारण उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन और उसकी संस्तुतियों के आधार पर आरक्षण तय करने की प्रक्रिया रही। दूसरा कारण राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तिथि 10 जून 2026 निर्धारित किया जाना था। सरकार का कहना है कि इन परिस्थितियों में 26 मई 2026 से पहले पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं था।
एडीसी के विधि छात्रों युधिष्ठिर वर्मा और आयुष पांडेय की ओर से दाखिल जनहित याचिका में कहा गया है कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित ग्राम प्रधानों को उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत प्रशासक नियुक्त करना संविधान के अनुच्छेद 243-ई की भावना के विपरीत है। राज्य सरकार के विस्तृत जवाब पर अगले सप्ताह मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ सुनवाई करेगी। इससे पहले याचिकाकर्ताओं को सरकार के काउंटर एफिडेविट का बिंदुवार जवाब दाखिल करना होगा।
Updated on:
06 Aug 2026 10:13 am
Published on:
06 Aug 2026 10:12 am
