
CJI सूर्यकांत (Photo - PTI)
UP Police Encounter Case: सुप्रीम कोर्ट में 3 सितंबर को उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों में हुई मौतों से जुड़े मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की गई। यह मामला मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के सामने रखा गया। वकील ने मामले की जल्द सुनवाई का अनुरोध किया, लेकिन ‘लाइव लॉ’ के मुताबिक CJI सूर्यकांत ने कहा, “नो अर्जेंसी।” वकील ने इस पर अदालत को बताया कि यह मामला करीब एक साल से सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया गया है। गौरतलब है कि जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पद संभाला था। अपने पहले दिन उन्होंने 17 मामलों की सुनवाई की थी।
उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों में हुई मौतों का मुद्दा नया नहीं है। यह मामला कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में उठाया जाता रहा है। साल 2019 में पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की ओर से इस संबंध में जनहित याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इन याचिकाओं में 2017 के दौरान उत्तर प्रदेश में हुई पुलिस मुठभेड़ों का आंकड़ा पेश किया गया था। याचिका के मुताबिक, उस साल प्रदेश में करीब 1,100 पुलिस मुठभेड़ हुई थीं। इनमें 49 लोगों की मौत और करीब 370 लोगों के घायल होने का दावा किया गया था। याचिका में इन मामलों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी।
इन आंकड़ों का राजनीतिक संदर्भ इसलिए भी अहम है क्योंकि साल 2017 में ही उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी थी। मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ ने पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभाला था। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश पुलिस की अपराध के खिलाफ कार्रवाई और एनकाउंटर नीति राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही। सरकार की ओर से इसे अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के तौर पर पेश किया गया, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने कई मुठभेड़ों की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।
PUCL के साथ Citizens Against Hate (CAH) की ओर से दाखिल जनहित याचिकाओं में मांग की गई थी कि योगी सरकार के कार्यकाल में हुई पुलिस मुठभेड़ों की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए। याचिकाकर्ताओं ने इसके लिए CBI या SIT जांच की मांग की थी। 14 जनवरी 2019 को तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था। उस समय अदालत ने मामले को गंभीर और महत्वपूर्ण बताया था तथा आगे सुनवाई के लिए तारीख तय की थी।
यूपी में पुलिस एनकाउंटर को लेकर बहस सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रही। मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रदेश में मुठभेड़ों में हुई मौतों और उनकी जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब 3 सितंबर को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग सामने आने से यह पुराना मामला चर्चा में आ गया है। हालांकि CJI सूर्यकांत की ओर से फिलहाल “नो अर्जेंसी” कहे जाने के बाद मामले की तत्काल सुनवाई नहीं हुई।
उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान हुई मौतों के आंकड़ों में साल-दर-साल उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में 41, 2019 में 34 और 2020 व 2021 में 26-26 मौतें दर्ज हुईं। 2022 में यह संख्या घटकर 13 रह गई, जबकि 2023 में 26 और 2024 में 25 मौतें हुईं। इसके बाद 2025 में आंकड़ा बढ़कर 48 पहुंच गया। वहीं, 2026 में मई तक 23 मौतें दर्ज की गई हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि मुठभेड़ों में मौतों का सिलसिला लगातार बना हुआ है, हालांकि अलग-अलग वर्षों में इसकी संख्या बदलती रही है।
Updated on:
03 Sept 2026 05:16 pm
Published on:
03 Sept 2026 05:16 pm
