7 अक्टूबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

UP में नया नियम: दहेज उत्पीड़न समेत 31 मामलों में सीधे FIR नहीं, पहले मजिस्ट्रेट का आदेश

UP Police to Stop Direct FIR in 31 Cases: उत्तर प्रदेश में दहेज उत्पीड़न और चेक बाउंस समेत 31 मामलों में अब पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। पहले मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही कार्रवाई की जाएगी।
3 min read
Google source verification

लखनऊ

•

image

Ritesh Singh

•

Mar 29, 2026

यूपी में 31 मामलों में अब सीधे एफआईआर नहीं: दहेज उत्पीड़न और चेक बाउंस जैसे मामलों में पहले मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी (Source: Police Media Cell)

यूपी में 31 मामलों में अब सीधे एफआईआर नहीं: दहेज उत्पीड़न और चेक बाउंस जैसे मामलों में पहले मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी (Source: Police Media Cell)

UP DGP Order: उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों की प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब दहेज उत्पीड़न, चेक बाउंस समेत कुल 31 श्रेणियों के मामलों में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। इन मामलों में पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष वाद दायर करना होगा, जिसके बाद न्यायालय के आदेश पर ही आगे की कार्रवाई होगी।

यह निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक मामले में की गई सख्त टिप्पणी के बाद लिया गया है। इसके अनुपालन में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने सभी जिलों के पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि नए नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।

क्या है नया आदेश

जारी निर्देशों के अनुसार, अब कुछ विशेष प्रकार के मामलों को ‘नॉन-कॉग्निजेबल’ या शिकायत आधारित प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा। यानी ऐसे मामलों में पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज नहीं करेगी, बल्कि शिकायतकर्ता को पहले संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत में प्रार्थना पत्र देना होगा। मजिस्ट्रेट यदि मामले को गंभीर पाते हैं, तभी पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और जांच शुरू करने का आदेश दिया जाएगा। इस प्रक्रिया से मामलों की प्रारंभिक जांच न्यायिक स्तर पर होगी, जिससे अनावश्यक या झूठे मामलों की छंटनी हो सकेगी।

किन मामलों पर लागू होगा नियम

नए आदेश के तहत दहेज झूठे मामलों पर लगेगी रोक उत्पीड़न (498A से जुड़े विवाद), चेक बाउंस, पारिवारिक विवाद, मारपीट के हल्के मामले और अन्य कई श्रेणियों को शामिल किया गया है। कुल मिलाकर 31 प्रकार के मामलों में यह व्यवस्था लागू होगी। इन मामलों को लेकर अक्सर यह शिकायत सामने आती रही है कि कई बार झूठे या अतिरंजित आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज कराई जाती है, जिससे निर्दोष लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद फैसला

इस बदलाव की पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट की एक टिप्पणी अहम मानी जा रही है। अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि कुछ मामलों में पुलिस बिना पर्याप्त जांच के एफआईआर दर्ज कर लेती है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होता है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया था कि ऐसे मामलों में पहले न्यायिक जांच होनी चाहिए, ताकि यह तय किया जा सके कि मामला दर्ज करने योग्य है या नहीं। इसी टिप्पणी को गंभीरता से लेते हुए पुलिस मुख्यालय ने यह नया आदेश जारी किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से झूठे और दुर्भावनापूर्ण मामलों पर काफी हद तक रोक लगेगी। खासकर दहेज उत्पीड़न जैसे मामलों में कई बार पारिवारिक विवाद को आपराधिक रूप देकर एफआईआर दर्ज कराई जाती थी। अब मजिस्ट्रेट की अनुमति अनिवार्य होने से ऐसे मामलों में एक प्रारंभिक जांच की परत जुड़ जाएगी, जिससे केवल वास्तविक मामलों में ही कार्रवाई आगे बढ़ेगी।

पीड़ितों के लिए क्या बदलेगा

हालांकि इस फैसले के कुछ सकारात्मक पहलू हैं, लेकिन इससे पीड़ितों के लिए प्रक्रिया थोड़ी लंबी हो सकती है। पहले जहां सीधे थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कराई जा सकती थी, अब उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा। इससे समय और संसाधनों की अतिरिक्त जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, न्यायिक निगरानी होने के कारण मामलों की गंभीरता और निष्पक्षता सुनिश्चित होने की संभावना भी बढ़ेगी।

पुलिस पर बढ़ेगी जवाबदेही

इस आदेश के बाद पुलिस की भूमिका भी अधिक जिम्मेदार और संतुलित हो जाएगी। अब पुलिस को हर शिकायत पर तुरंत एफआईआर दर्ज करने के बजाय कानून के निर्धारित प्रावधानों का पालन करना होगा। डीजीपी ने सभी अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे इस नई व्यवस्था को गंभीरता से लागू करें और किसी भी तरह की लापरवाही या उल्लंघन पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता की उम्मीद

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और संतुलन आएगा। इससे न केवल झूठे मामलों में कमी आएगी, बल्कि वास्तविक मामलों को भी अधिक गंभीरता से लिया जाएगा। हालांकि, यह भी जरूरी होगा कि मजिस्ट्रेट स्तर पर मामलों की सुनवाई तेजी से हो, ताकि पीड़ितों को अनावश्यक देरी का सामना न करना पड़े।