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सपा के दिग्गज नेता विजय सिंह का निधन, 8 बार MLA रहे, मुलायम की सरकार में थे मंत्री

Vijay Singh Gond Death: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दुद्धी विधायक विजय सिंह गोंड का लखनऊ के एसजीपीजीआई में इलाज के दौरान निधन हो गया। लंबे समय से बीमार चल रहे गोंड की दोनों किडनियां खराब थीं। उनके निधन से सोनभद्र सहित पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई है।

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Jan 08, 2026

लखनऊ के एसजीपीजीआई में चल रहा था इलाज, लंबे समय से थे गंभीर रूप से बीमार (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

लखनऊ के एसजीपीजीआई में चल रहा था इलाज, लंबे समय से थे गंभीर रूप से बीमार (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

Vijay Singh Gond  SP Leader Dudhi MLA: समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और दुद्धी विधानसभा क्षेत्र से विधायक विजय सिंह गोंड का लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में इलाज के दौरान निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और उनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी थीं। उनके निधन की पुष्टि विधानसभा अध्यक्ष अवध नारायण यादव ने की। जैसे ही उनके निधन की खबर सामने आई, पूरे सोनभद्र जनपद सहित आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई।

लंबे समय से चल रहा था इलाज

जानकारी के अनुसार, विजय सिंह गोंड की तबीयत काफी समय से खराब चल रही थी। किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारी के चलते उन्हें लखनऊ के एसजीपीजीआई में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था। तमाम प्रयासों के बावजूद चिकित्सक उन्हें बचा नहीं सके और इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही पार्टी नेताओं, समर्थकों और शुभचिंतकों में गहरा दुख व्याप्त हो गया।

आदिवासी राजनीति के ‘पितामह’

विजय सिंह गोंड को सोनभद्र की दुद्धी विधानसभा और पूरे दक्षिणी उत्तर प्रदेश में आदिवासी राजनीति का ‘पितामह’ माना जाता था। प्रदेश की 403वीं और अंतिम विधानसभा सीट दुद्धी से उन्होंने आदिवासी समाज की आवाज को दशकों तक मजबूती से उठाया। उनके निधन को आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति के लिए भी एक अपूरणीय क्षति के रूप में देखा जा रहा है।

आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में अग्रणी भूमिका

विजय सिंह गोंड आदिवासी समाज के अधिकारों और पहचान की लड़ाई के अग्रणी नेताओं में शुमार थे। उन्होंने दुद्धी और ओबरा विधानसभा क्षेत्रों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) सीट घोषित कराने के लिए लंबा संघर्ष किया और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। उनका यह प्रयास आदिवासी समाज के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है।

साधारण जीवन से असाधारण राजनीति तक

विजय सिंह गोंड का राजनीतिक सफर बेहद साधारण पृष्ठभूमि से शुरू हुआ। वे वनवासी सेवा आश्रम में मात्र 200 रुपये मासिक मानदेय पर कार्यरत थे। वर्ष 1979 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर राजनीति में कदम रखा। यह जीत केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि आदिवासी समाज के लिए भी एक नई शुरुआत थी।

राजनीति में निरंतर संघर्ष और सफलता

पहली जीत के बाद विजय सिंह गोंड ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 1989 में उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु रामप्यारे पनिका को हराकर आदिवासी राजनीति में एक नया अध्याय लिखा। इसके बाद वे विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े, लेकिन उनका मूल उद्देश्य हमेशा आदिवासी समाज के हितों की रक्षा और उनके अधिकारों को स्थापित करना ही रहा।

आठ बार बने विधायक

विजय सिंह गोंड कुल आठ बार विधानसभा सदस्य रहे। यह उपलब्धि उन्हें उत्तर प्रदेश के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली विधायकों की श्रेणी में खड़ा करती है। उन्होंने विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों जगह आदिवासी समाज के मुद्दों को मजबूती से उठाया। जंगल, जमीन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषय उनके प्रमुख एजेंडे रहे।

सदन में बुलंद रही आदिवासी आवाज

विधानसभा में विजय सिंह गोंड की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में थी, जो बिना किसी संकोच के आदिवासी समाज के अधिकारों की बात करता था। उन्होंने सदन में कई बार वनाधिकार कानून, विस्थापन, खनन प्रभावित क्षेत्रों और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए। उनके प्रयासों से आदिवासी समाज को प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में एक नई पहचान मिली।

राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक

विजय सिंह गोंड के निधन पर राजनीतिक दलों के नेताओं, सामाजिक संगठनों और आदिवासी समुदाय के लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने उन्हें पार्टी का मजबूत स्तंभ बताते हुए कहा कि उनका जाना पार्टी और प्रदेश दोनों के लिए बड़ी क्षति है। समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने उन्हें एक सादा जीवन जीने वाला, संघर्षशील और जनसेवा के प्रति समर्पित नेता बताया।

सोनभद्र में शोक की लहर

उनके निधन की खबर फैलते ही सोनभद्र, दुद्धी, ओबरा और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में लोग उनके आवास और पार्टी कार्यालयों पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। आदिवासी समाज के लोगों ने उन्हें अपना मार्गदर्शक और संरक्षक बताते हुए कहा कि उनके जाने से एक युग का अंत हो गया है।