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पृथ्वी का ‘सुरक्षा कवच’- ओज़ोन परत, इसे बचाएं

वर्ष 1995 के बाद से हर साल 16 सितम्बर को ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस का आयोजन किया जाता है। 

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लखनऊ

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Akansha Singh

Sep 16, 2016

ozone

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लखनऊ। आज विश्व ओज़ोन दिवस (World Ozone Day) या ‘ओज़ोन परत संरक्षण दिवस’ है। ओजोन लेयर पृथ्वी का सुरक्षा कवच माना जाता है। लेकिन पृथ्वी पर बढ़ रहे प्रदूषण के कारण ये लेयर घटती जा रही है।
कैसे शुरू हुआ ओजोन दिवस
वर्ष 1995 के बाद से हर साल 16 सितम्बर को ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन मुख्यतःओजोन परत के क्षरण के बारे में लोगों को जागरूक करने और इसे बचाने के बारे में संभव समाधान का खोज करने के लिए मनाया जाता है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने की स्मृति में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने संकल्प के तहत इस तिथि को चुना था।
क्या है मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल पर वार्ता करने और सेमिनार आयोजित करने के लिए प्रतिवर्ष 16 सितंबर की तिथि को लोग एकत्रित होते हैं। इस वार्ता में चर्चा का प्रमुख विषय ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ होते हैं। यह वार्ता वस्तुतः ओजोन परत के सन्दर्भ में एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसमें ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है। साथ ही देशो से इसके उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित करने का संकल्प लिया जाता है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 16 सितंबर, 1987 को विभिन्न देशों के मध्य हस्ताक्षरित किया गया था लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन 1 जनवरी, 1989 को हुआ था। ऐसा विश्वास किया जाता है की वर्ष 2050 तक ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थों के उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जायेगा। वर्ष 2012 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की 25 वीं वर्षगांठ को मनाया गया है।
है क्या ओजोन लेयर
ओजोन (O3) का एक अणु आॅक्सीजन के तीन अणुओं के जुड़ने से बनता है। इसका रंग हल्का नीला होता है और इससे एक विशेष प्रकार की तीव्र गंध आती है। भूतल से लगभग 50 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडल ऑक्सीजन, हीलियम, ओजोन, और हाइड्रोजन गैसों की परतें होती हैं, जिनमें ओजोन परत धरती के लिए एक सुरक्षा कवच का कार्य करती है क्योंकि यह ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैगनी किरणों से धरती पर मानव जीवन की रक्षा करती है। सूरज से आने वाली ये पराबैगनी किरणें मानव शरीर की कोशिकाओं की सहन शक्ति के बाहर होती है।
क्या ओजोन परत का क्षय
अध्ययनों में यह पाया गया है की वायुमंडल में ओजोन की मात्रा धीरे धीरे काम होती जा रही है। ओजोन परत के क्षय की जानकारी सर्वप्रथम 1960 में हुयी। वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाया है कि अंटार्कटिका महादीप के ऊपर ओजोन परत में एक छेद हो गया है और यह प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के प्रयासों से यह पता लग पाया की वायुमंडल में प्रतिवर्ष के हिसाब से 0.5 % ओजोन की मात्रा कम हो रही है।
एक अध्यन में पाया गया की अंटार्कटिका के ऊपर वायमंडल में कूल 20 से 30 प्रतिशत ओजोन कम हो गयी है। न सिर्फ अंटार्कटिका बल्कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों के ऊपर भी वायुमंडल में ओजोन परत में होने वाले छिद्रों को पाया गया है। बढ़ते समय के साथ-साथ अब उत्तरी ध्रुव पर भी बसंत ऋतु में इस प्रकार के छिद्र दिखाई देने लगे हैं।
क्यों हो रहा ओजोन परत का क्षय
ओजोन परत के छय का मुख्य कारण कुछ और नहीं बल्कि हम खुद हैं। मानवीय क्रियाकलापों ने अज्ञानता के चलते वायमंडल में कुछ ऐसी गैसों की मात्रा को बढ़ा दिया है जो धरती पर जीवन रक्षा करने वाली ओजोन परत को नष्ट कर रही हैं।
लखनऊ विश्विद्यालय के निशांत शर्मा जो भूगोल विषय का अध्ययन कर रहे हैं, ने बताया कि क्लोरो फ्लोरो कार्बन ओजोन परत में होने वाले विघटन के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। इसके अलावा हैलोजन, मिथाइल क्लोरोफॉर्म, कार्बन टेट्राक्लोरिडे आदि रसायन पदार्थ भी ओजोन को नष्ट करने में सक्षम हैं। आपको बता दें कि इन रसायन पदार्थों को ही हम "ओजोन क्षरण पदार्थ" कहते हैं। इनका उपयोग हम मुख्यत: अपनी दैनिक सुख सुविधाओ में करते हैं जैसे एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, फोम, रंग, प्लास्टिक इत्यादि।
आईटी कॉलेज से रसायन विज्ञान में एमएससी करने वाली श्रुति सिंह के अनुसार हम दैनिक जीवन में बहुत सी इलेक्ट्रॉनिक चीजों का उपयोग करते हैं जिनमें से कोई न कोई गैस का रिसाव जरूर होता है। इनमें मुख्य रूप से एयर कंडीशनर है जिसमें प्रयुक्त गैस फ्रियान-11, फ्रियान-12 है। यह गैस ओजन के लिए हानिकारक है क्योंकि इन गैसों का एक अणु ओजोन के लाखों अणुओं को नष्ट करने में सक्षम है। धरती पर पेड़ों की बढ़ती अंधाधुंध कटाई भी इसका एक कारण है। पेड़ों की कटाई से पर्यायवरण में ऑक्सीजन की मात्रा काम होती है जिसकी वजह से ओजोन गैस के अणुओं का बनना कम हो जाता है।
ओजोन परत क्षय के दुष्प्रभाव
ओजोन परत के बढ़ते क्षय के कारण अनेकों दुःप्रभाव हो सकते हैं। जैसे की सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणें धरती पर वायुमंडल में प्रवेश कर सकती हैं, जोकि बेहद ही गरम होती हैं और पेड़ पौधों तथा जीव जन्तुओं के लिए हानिकारक भी होती हैं। मानव शरीर में इन किरणों की वजह से त्वचा का कैंसर, श्वशन रोग, अल्सर, मोट्याबिंद् यदि जैसी घातक बीमारिया हो सकती हैं। साथ ही साथ ये किरणें मानव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करती हैं। ओजोन परत के बढ़ते क्षय के कारण आने वाले कुछ वर्षों में त्वचा कैंसर से पीड़ित रोगों की संख्या के बढ़ने के अनुमान है।
ओजोन परत संरक्षण हेतु विश्वस्तरीय प्रयास
ओजोन-क्षय विषयों से निबटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समझौते हेतु अंतर-सरकारी बातचीत 1981 में प्रारंभ हुई।
मार्च, 1985 में ओजोन परत के बचाव के लिए वियना में एक विश्वस्तरीय सम्मेलन हुआ, जिसमें ओजोन संरक्षण से संबंधित अनुसंधान पर अंतर-सरकारी सहयोग, ओजोन परत के सुव्यवस्थित तरीके से निरीक्षण, सीएफसी उत्पादन की निगरानी और सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे मुद्दों पर गंभीरता से वार्ता की गयी। सम्मेलन के अनुसार मानव स्वास्थ्य और ओजोन परत में परिवर्तन करने वाली मानवीय गतिविधियों के विरूद्ध वातावरण बनाने जैसे आम उपायों को अपनाने पर देशों ने प्रतिबद्धता व्यक्त की।
1987 में सयुक्त राष्ट्र संघ ने में ओजोन परत में हुए छेदों से उत्पन्न चिंता के निवारण हेतु कनाडा के मांट्रियाल शहर में 33 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसे “मांट्रियाल प्रोटोकाल” कहा जाता है। इस सम्मेलन में यह तय किया गया कि ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थ जैसे क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.) के उत्पादन एवं उपयोग को सीमित किया जाए। भारत ने भी इस प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर किए।
1990 में मांट्रियल संधि पर हस्ताक्षर करने वाले देशों ने 2000 तक सी.ऍफ़.सी. और टेट्रा क्लोराइड जैसी गैसों के प्रयोग पर भी पूरी तरह से बंद करने की शुरुआत की।
भारत में ओजोन क्षरण पदार्थ सम्बंधित कार्य का संचालन मुख्यत पर्यायवरण एवं वन मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है। साथ ही साथ "स्माल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन", इंदौर का भी इसमें सहयोग है।
हर वर्ष 16 सितमबर को ओजोन दिवस के रूप में मनाया जाता है ताकि इस दिन ओजोन परत से जुड़े तथ्यों के बारे में जागरूकता बनाई जा सके।
देखें वीडियो-
ऐसे करें ओजोन परत की सुरक्षा

  • ऐसे सौंदर्य प्रसाधन और एयरोसोल और प्लास्टिक के कंटेनर, स्प्रे जिसमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) विद्यमान हैं उन उत्पादों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  • पर्यावरण के अनुकूल उर्वरक का प्रयोग करें।



  • अपने वाहन से अत्यधिक धुआं उत्सर्जन को रोकने के लिय वाहनों का नियमित रखरखाव करें। इस तरह से हम अपने वाहनों के पेट्रोल और कच्चे तेल का बचत कर सकते हैं।


  • प्लास्टिक और रबर से बने टायर को जलाने से बचना चाहिए।
  • अधिक से अधिक वृक्ष लगायें ताकि ऑक्सीजन अधिक से अधिक मात्र में वायमण्डल में बनी रहे और इससे ओजोन अणुओं का निर्माण हो।






ओजोन डे 2016 थीम


इस बार ओज़ोन डे की थीम 'ओजोन एंड क्लाइमेट : रीस्टोर्ड बाई ए वर्ल्ड यूनाइटेड' हैं।

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