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शंखोद्धार महादेव के वर्ष 2026 में भी नहीं होंगे दर्शन

2012 के बाद 2018 में हुए थे दर्शन इसके बाद नहीं हुए दर्शन -गांधीसागर बांध में जलस्तर के कारण डूब क्षेत्र में मंदिर

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2012 के बाद 2018 में हुए थे दर्शन इसके बाद नहीं हुए दर्शन

मंदसौर.क्षेत्र में चंबल नदी पर स्थित गांधीसागर बांध के बैकवाटर में स्थित शंखोद्धार महादेव इस वर्ष भी दर्शन नहीं देंगे। वर्ष 2012 से 6 साल बाद यानि वर्ष 2018-19 में गांधीसागर का जलस्तर कम होने की स्थिति में शंखोद्धार महादेव ने दर्शन दिए थे। किंतु वर्तमान मे गांधीसागर बांध का जलस्तर 1298 फीट के लगभग है एवं अभी जून माह का प्रथम सप्ताह चल रहा है। बांध पर अभी विद्युत जनरेशन भी नही हो रहा है। ऐसे में इस बारर दर्शन होना संभव नहीं है। करीब 1284 जलस्तर होने पर पानी कम होने की स्थिति में मंदिर पर दर्शन संभव है। लगभग 14 फिट पानी यदि जनरेशन भी हो तो जलस्तर कम होना 2026 जुलाई तक संभव नही हैं। अभी मंदिर का ऊपरी हिस्सा दिखाई दे रहा है। महाभारत काल में इस मंदिर का निर्माण बताया जाता है। ऐसे में यह मंदिर व यहां दर्शन करना अहम है।


शंखोद्धार महादेव महाभारत युगीन मंदिर
गांधीसागर जलाशय व चंबल नदी की गोद में स्थापित महाभारत कालीन प्राचीन मंदिर शंखोद्वार महादेव का मंदिर पिछले 8 सालों से पानी में डूबा हुआ है। जब बांध का पानी अपनी पूरी लेवल पर होता है तो मंदिर पर करीब 5 फिट पानी रहता है। जबकि जमीन से मंदिर की ऊंचाई भी 20 फिट के करीब है। पिछले 8 साल से गांधीसागर बांध का जलस्तर ज्यादा कम नही हो रहा है जिसके चलते इस मंदिर के दर्शन हो सके। बताया जाता है कि शंखोद्वार महादेव मंदिर में अकाल मृत्यु होने वाले मृत आत्माओं का तर्पण होता है ओर उनको मुक्ति मिलती है। जब भी यह मंदिर पानी से बाहर आता है देशभर से असमय काल की ग्रास बने अपने परिजनों के मोक्ष की कामना लेकर यहां आते हैं और विधि विधान से उनका पिंडदान करते है।


पांडवों ने यहां बिताया था अज्ञातवास
बताया जाता है कि यहां महाभारत काल मे पांडवों ने अज्ञातवास बिताया था। उसी समय यहां पर भीम ने शंखासुर नामक राक्षस का वध किया था तब शंखासुर ने पांडवों से वरदान मांगा था कि आपके साथ मुझे भी इतिहास में याद किया जाए तब पांडवों ने यहां एक शिवलिंग की स्थापना की ओर उसका स्थान का नाम शंखोद्वार रखा ओर उसको वरदान दिया था किअकाल मौत मरने वाली आत्माओं को यहां के अलावा कही नहीं मुक्ति मिलेगी। जिसका वर्णन महाभारत में भी आता है। बताया जाता है कि यह शिवलिंग 6 माह जमीन के अंदर ओर 6 माह जमीन से एक फिट बाहर रहता है।


यहां लगता था मेला
जिले में बांध बनने से पहले यहां गंगामाता शंखोद्वार महादेव के नाम से मेला लगता था। जिसकी ख्याति दूर-दूर तक थी। आजादी के बाद 1950 में गांधीसागर बांध बनने के बाद हजारो गांव डूब क्षेत्र में आ गए। उसी के साथ यह स्थान भी इतिहास के पन्नो में गुम हो गया। तब से अब तक यहां जब-जब भी यह मंदिर पानी से बाहर आता है तो कई भक्त दर्शन करने आते हैं। यहां रामपुरा से 25 किमी दूर दुधलई से देवरान एचचोर लोटवास होकर अपने वाहन से पहुंचा जा सकता है।

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