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जब नहीं था साबुन-सर्फ तो ऐसे चमकाए जाते थे राजा-रानियों के कपड़े, नुस्खा जानकर करेंगे तारीफ

महंगे कपड़े चमकाने के लिए उन दिनों नहीं था साबुन और महंगा डिटरजेंट। धोबी घाट आज भी उसी परंपरा का कर रहे निर्वाहन। 1897 में मेरठ में लगा था देश का पहला साबुन कारखाना।

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मेरठ

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Rahul Chauhan

Aug 11, 2021

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मेरठ। आज बाजार में डिटजेंट और ब्रांडेड साबुनों (Soaps And Detergent) की भरमार है। हर साबुन कंपनी का दावा कि उनकी साबुन से बेहतर धुलाई (Cloth Washing) और कोई नहीं कर सकता। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजा—महाराजा (King And Queen) या श्रीराम और कृष्ण के युग में उनके कपड़े किस वास्तु से धोए जाते थे जो कि इतने साफ और कीटाणु रहित होते थे। ये जानने की जिज्ञासा सभी को होगी। लेकिन यह सत्य है कि उस दौर में किसी प्रकार का कोई साबुन सा डिटजेंट नहीं था सिर्फ एक ऐसा फल था जिससे कपड़े की साफ—सफाई होती थी और धोबी श्री कृष्ण और श्रीराम के युग में कपड़ों की धुलाई उसी फल से करते थे। जिससे वे आज के डिटर्जेट और साबुन से भी अधिक साफ और कीटाणुरहित होते थे।

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मेरठ कालेज के इतिहास के प्रोफेसर डा0 विध्नेश त्यागी बताते हैं कि देश वनस्पति और आयुर्वेद के मामले में हमेशा से संपन्न रहा है। रीठा का पेड़ जो कि त्रेतायुग से भी पुराना बताया जाता है। अब कपड़ों की सफाई के लिए इसी रीठा का उपयोग किया जाता था। श्रीराम और कृष्ण के युग में इसी रीठा से महंगे रेशमी वस्त्रों को साफ किया जाता है। उस दौर में रीठा के बाग लगाए जाते थे। रीठा से कपड़े धोने का चलन 16 ईसवीं तक रहा। हालांकि महंगे रेशमी वस्त्रों को कीटाणु मुक्त और साफ करने के लिए रीठा आज भी सबसे बेहतरीन ऑर्गेनिक प्रोडक्ट है। इसका उपयोग आज भी किया जाता है।

डा. विध्नेश त्यागी कहते हैं कि रीठा प्राचीन भारत का सुपर सोप कहा जाता था। इसके छिलकों से झाग पैदा होता था, जिससे कपड़ों की सफाई होती थी, वो साफ भी हो जाते थे और उन पर चमक भी आ जाती थी। रीठा कीटाणुनाशक का भी काम करता था। प्राचीन भारत में रानियां अपने बड़े बालों को इसी से धोती थीं। गर्म पानी में डालकर उबाला जाता था कपड़ों को तब दो तरह से कपड़े साफ होते थे। आम लोग अपने कपड़े गर्म पानी में डालते थे और उसे उबालते थे। फिर इसे उसमें निकालकर कुछ ठंडा करके उसे पत्थरों पर पीटते थे, जिससे उसकी मैल निकल जाती थी। ये काम बड़े पैमाने पर बड़े बड़े बर्तनों और भट्टियों लगाकर किया जाता था। हालांकि ये परंपरा आज भी बड़े शहरों में धोबी घाटों में कायम है।

17वीं सदी में आया खास पाउडर रेह

एक तरीका साफ करने का और था, जो खूब प्रचलित था। ग्रामीण क्षेत्रों में खाली पड़ी भूमि पर, नदी-तालाब के किनारे अथवा खेतों में किनारे पर सफेद रंग का पाउडर दिखाई देता है जिसे ‘रेह’ कहा जाता है। देश में नदियों और तालाबों की जमीन के किनारे पर यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसका कोई मूल्य नहीं होता। इस पाउडर को पानी में मिलाकर कपड़ों को भिगो दिया जाता था। इसके बाद कपड़ों लकड़ी की थापी या पेड़ों की जड़ों से बनाए गए जड़ों से रगड़कर साफ कर दिया जाता था।

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भारतीय मिट्टी और राख से रगड़कर नहाते थे

प्राचीन भारत ही नहीं बल्कि कुछ दशक पहले तक भी मिट्टी और राख सो बदन पर रगड़कर भी भारतीय नहाया करते थे या फिर अपने हाथ साफ करते थे। राख और मिट्टी का इस्तेमाल बर्तनों को साफ करने में भी होता था। पुराने समय में लोग सफाई के लिए मिट्टी का प्रयोग करते थे। 130 साल पहले अंग्रेज भारत लाए थे साबुन :— देश में साबुन की शुरुआत 130 साल से पहले ब्रिटिश शासन में अंग्रेजों ने शुरू की थी। लीबर ब्रदर्स इंग्‍लैंड ने भारत के बाजार में पहली बार साबुन उतारा था। इसके बाद 1897 में मेरठ में देश का पहला साबुन कारखाना लगा था। ये कारोबार खूब फला फूला। उसके बाद जमशेदजी टाटा इस कारोबार में पहली भारतीय कंपनी के तौर पर कूदे।