
अखिलेश यादव और जयंत चौधरी।
Jat Gurjar Politics:उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच पश्चिमी यूपी की सियासत में जातीय समीकरण एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। यहां जाट और गुर्जर लंबे समय से चुनावी राजनीति में असरदार माने जाते हैं। दोनों समुदायों की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक प्रभाव को देखते हुए लगभग हर प्रमुख दल इन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता रहा है। इस बार समीकरण इसलिए भी दिलचस्प हैं क्योंकि राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष जयंत चौधरी भाजपा के साथ सत्ता के गठबंधन में हैं।
ऐसे में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का जयंत चौधरी पर 'चवन्नी' वाला तंज केवल सियासी हमला नहीं माना जा रहा। राजनीतिक गलियारों में इसे पश्चिमी यूपी के उन मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है, जिनका रालोद से सीधा या पारंपरिक जुड़ाव नहीं है। खास तौर पर गुर्जर समाज पर सपा का बढ़ता फोकस इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पश्चिमी यूपी की राजनीति में जाट समाज को लंबे समय तक रालोद का मजबूत आधार माना गया। इसकी बड़ी वजह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत रही है। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में जाट समाज के एक हिस्से की भाजपा के साथ नजदीकी बढ़ी है। इसके साथ ही भाजपा ने गुर्जर समाज को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संगठन में महत्व देने की कोशिश की है। यही बदलाव सपा के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद साथ आए थे। दोनों दलों के गठबंधन से पश्चिमी यूपी में सियासी समीकरण बदले और दोनों को इसका लाभ मिला। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में रालोद के भाजपा के साथ जाने के बाद सपा के सामने पश्चिमी यूपी में अपने पुराने सामाजिक आधार को बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा इसी खाली जगह को भरने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।
सपा की रणनीति में गुर्जर समाज की भूमिका पिछले कुछ समय में ज्यादा दिखाई दी है। सम्राट मिहिर भोज से जुड़े विवाद के दौरान भी पार्टी ने गुर्जर समाज के पक्ष में अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट की थी। यह मुद्दा धीरे-धीरे सिर्फ इतिहास से जुड़ा विवाद नहीं रहा, बल्कि पश्चिमी यूपी में सामाजिक पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ गया। इसके बाद दादरी में गुर्जर समाज को केंद्र में रखकर महासभा का आयोजन भी सपा की इसी दिशा की ओर इशारा करता है। पार्टी के भीतर यह संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है कि पश्चिमी यूपी में उसका सामाजिक आधार सिर्फ जाटों तक सीमित नहीं है, बल्कि गुर्जर समेत दूसरे पिछड़े और किसान समुदाय भी उसके साथ जुड़ सकते हैं। सपा के पीडीए समीकरण में भी गुर्जर समाज को महत्वपूर्ण स्थान देने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, जयंत चौधरी पर अखिलेश यादव का हमला दो स्तरों पर असर डालने की कोशिश हो सकता है। पहला, रालोद के प्रभाव को सीधे चुनौती देना और दूसरा, ऐसे मतदाताओं को अपने साथ जोड़ना जो जाट राजनीति से अलग पश्चिमी यूपी के दूसरे प्रभावशाली समुदायों से आते हैं। यानी सपा के लिए सवाल केवल रालोद को कमजोर करने का नहीं है। पार्टी 2027 में पश्चिमी यूपी के सामाजिक समीकरण को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश करती दिख रही है।
गुर्जर समाज के साथ सपा का जुड़ाव नया नहीं है। दादरी के गुर्जर नेता महेंद्र सिंह भाटी को मुलायम सिंह यादव का करीबी माना जाता था और पश्चिमी यूपी की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ थी। सपा के शुरुआती दौर में भी रामशरण दास को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके बाद राम सकल गुर्जर, नरेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह और सुरेंद्र नागर जैसे नेताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका मिली। आज भी सपा के पास पश्चिमी यूपी में गुर्जर समाज से जुड़े कई प्रमुख चेहरे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी के अलावा इकरा हसन, अतुल प्रधान और मुखिया गुर्जर जैसे नेता भी अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी का सामाजिक आधार मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।
हालांकि सपा की रणनीति को सिर्फ गुर्जर समाज तक सीमित करना सही नहीं होगा। पार्टी पश्चिमी यूपी में जाट समाज के बीच भी अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कई जिलों में जाट नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी दी गई है। मुजफ्फरनगर से हरेंद्र मलिक की लोकसभा चुनाव में जीत भी पार्टी के लिए पश्चिमी यूपी में जाट समर्थन का महत्वपूर्ण संकेत रही। इसके बावजूद सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह जाट और गुर्जर दोनों समुदायों के बीच संतुलन कैसे बनाए। रालोद के भाजपा के साथ होने से बदले समीकरण में सपा अगर गुर्जर समाज में अपनी पकड़ बढ़ाती है और साथ ही जाट मतदाताओं के एक हिस्से को बनाए रखती है, तो 2027 में पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। फिलहाल 'चवन्नी' वाला बयान सिर्फ जुबानी जंग नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी में 2027 की चुनावी बिसात पर बदलते सामाजिक समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है। आने वाले महीनों में सपा, भाजपा और रालोद की रणनीति यह तय करेगी कि जाट-गुर्जर वोट का झुकाव किस तरफ जाता है।
Updated on:
25 Aug 2026 01:20 pm
Published on:
25 Aug 2026 01:20 pm
