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हिंदू मुस्लिम एकता की वकालत करने वाले थे सयानी, यौम ए वफात पर दी श्रद्धांजलि

आज देश की जानी मानी राजनीतिज्ञ हस्ती रहमतुल्लाह मोहम्मद सयानी का यौमे ए वफात मनाया गया। इस दौरान जैदी फार्म में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें भारतीय राजनीतिज्ञ रहमतुल्लाह मोहम्मद सयानी के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके बारे में जानकारी दी गई। इस दौरान डा0शमशुद्दीन कहा कि रहमतुल्लाह मोहम्मद सयानी एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे। जिन्होंने 1896 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

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मेरठ

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Kamta Tripathi

Jun 07, 2022

हिंदू मुस्लिम एकता की वकालत करने वाले थे सयानी, यौम ए वफात पर दी श्रद्धांजलि

हिंदू मुस्लिम एकता की वकालत करने वाले थे सयानी, यौम ए वफात पर दी श्रद्धांजलि

देश के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञों में से एक रहमतुल्लाह मोहम्मद सयानी का आज यौम ए वफात मनाया गया। इस दौरान वक्ताओं ने उनकेा श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके बारे में लोगों को जानकारी दी। वक्ता डा0शमशुदृीन ने बताया कि सयानी का जन्म 5 अप्रैल 1847 में मुस्लिम घराने में हुआ था। वे आगा खान के शिष्य भी रहे। वे पेशे से एक वकील थे, जिन्होंने सार्वजनिक प्रतिष्ठा और पेशेवर उत्कृष्टता हासिल की थी।


1888 में चुने गए थे बॉम्बे निगम के अध्यक्ष
रहमतुल्ला देश के ऐसे पहले मुस्लिम नेता थे जिन्हें बॉम्बे नगर निगम के सदस्य के रूप में चुना गया। उसके बाद सन 1888 में वो निगम के अध्यक्ष के रूप में चुने गए। दो बार बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए चुने गए और इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ( 1896-1898 ) के लिए भी चुने गए। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापना से भी जुड़े थे और उन दो भारतीय मुसलमानों में से एक थे। जिन्होंने 1885 में बॉम्बे में आयोजित कांग्रेस के पहले सत्र में भाग लिया था। जहां वोमेश चंद्र बनर्जी को पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था।

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कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दिया था संबोधन
वर्ष 1896 में उन्होंने कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस के 12 वें वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता की। रहमतुल्लाह एम सयानी, बदरुद्दीन तैयबजी के बाद राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने वाले दूसरे मुस्लिम थे। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पार्टी के लिए उनका संबोधन ब्रिटिश शासन के आर्थिक और वित्तीय पहलुओं पर विस्तृत रूप से देखने के लिए उल्लेखनीय था। वह 1899 में बॉम्बे के प्रतिनिधियों में से एक के रूप में गठित कांग्रेस कार्यकारी समिति ( भारतीय कांग्रेस कमेटी ) के सदस्य थे। सयानी ने मुसलमानों से कांग्रेस में शामिल होने का आग्रह किया था।

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हिंदू मुस्लिम को जोडने की वकालत करते थे सयानी
प्रोफेसर रिजवी ने कहा कि रहमतुल्लाह एम सयानी पश्चिमी शिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने इसे मुसलमानों के लिए विशेष रूप से आवश्यक माना था। वह हिन्दू मुसलमान को जोड़े रखने की वकालत करते थे। उनका कहना था कि हमें भारत के सभी महान समुदायों के बीच व्यक्तिगत अंतरंगता और दोस्ती को बढ़ावा देना चाहिए और राष्ट्रीय विकास और एकता की भावनाओं को विकसित तथा मजबूत करने चाहिए। 6 जून 1902 को बॉम्बे के उनके आवास पर उनका निधन हो गया। उनके यौम ए—वफात के दिन आज हमे उनके जिंदगी से तालीम लेनी चाहिए।