
घनश्याम सिंह मौर्य। PC: वीडियो ग्रैब/ Donatekart
चिलचिलाती धूप में अगर प्यास बुझाने के लिए पानी मिल जाए, तो यह किसी वरदान से कम नहीं। घनश्याम सिंह मौर्य पिछले छह सालों से उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के अहरौरा गांव के लोगों को यही वरदान बांट रहे हैं। उन्होंने कई ऐसी जगहों पर 200 से ज्यादा मटके रखे हुए हैं, जहां अमूमन राह चलते लोगों को पीने के लिए पानी नहीं मिलता और अगर मिलता भी है तो साफ नहीं होता। घनश्याम सिंह मौर्य अपनी पत्नी शशि लता के साथ अल सुबह ही इन मटकों को भरने के लिए घर से निकल जाते हैं। उनके पास एक हथठेला है, जिस पर पानी की बड़ी-बड़ी कैन रखकर वह कई किलोमीटर दूर का सफर करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हर मटका ताजे पानी से भरा रहे।
कई जगह पर वह पानी के साथ-साथ गमछा, चप्पल और बिस्कट आदि की भी व्यवस्था करते हैं। ताकि धूप से बचने के लिए लोग गमछा इस्तेमाल कर सकें, नंगे पैर हों तो चप्पल पहन सकें और भूख लगे तो बिस्किट खाकर से कुछ राहत पाएं। 52 साल से घनश्याम सिंह मौर्य हर साल गर्मी के मौसम में व्यस्त चौराहों, बाजार, बस स्टॉप, सरकारी अस्पताल के साथ-साथ ऐसे स्थानों पर पानी का इंतजाम करते हैं, जहां मजदूर काम के लिए एकत्र होते हैं।
घनश्याम और उनकी पत्नी रोजाना हर मटके में ताजा पानी भरते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि मटका साफ रहे। वह बताते हैं कि यह एक पहाड़ी इलाका है, और यहाँ अक्सर गंदा पानी आता है। गंदे पानी के चलते घनश्याम ने अपनी मां को खो दिया था। 2015 में उनकी मां को एनीमिया हुआ और 2017 में उनकी मौत हो गई। दूषित पानी की वजह से गांव के लोग अक्सर बीमार होते रहते थे। इस एक घटना से घनश्याम को शुद्ध पानी के लिए एक अभियान छेड़ने के लिए प्रेरित किया और इसी से उनकी पहचान ‘मटका मैन’ के रूप में हो गई। घनश्याम ने कहा- मैं लोगों को साफ पानी उपलब्ध कराना चाहता था, लेकिन गांव के लिए बोरवेल नहीं खुदवा सकता था और न ही फ़िल्ट्रेशन प्लांट लगवा सकता था। बस इतना कर सकता था कि एक मटके में उनके लिए पीने का पानी भरकर ले जाऊं। धनश्याम ने दिहाड़ी मज़दूर के रूप में जो कुछ कमाया उससे एक मिट्टी का घड़ा खरीदा। फिर दूसरा, तीसरा और ऐसे ही यह सिलसिला आगे बढ़ता गया।
घनश्याम और उनकी पत्नी दिन में दो बार मटकों में पानी भरते हैं। उनका ये सफर अहरौरा बाज़ार से शुरू होता है, जहां RO मशीन वाले कुछ दुकानदार उन्हें 500-लीटर का टैंक मुफ्त में भरने देते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि पानी कहां जा रहा है। पहले धनश्याम बैटरी से चलने वाला रिक्शा किराये पर लेते थे, ताकि दूर तक पानी उपलब्ध कराया जा सके। ईरिक्शा से वो करीब 100 किलोमीटर तक पानी का वितरण कर लेते थे पर अब उनकी आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती। इसलिए वह हथठेले का ही इस्तेमाल करते हैं, जिसके चलते अब उनका कार्यक्षेत्र सिर्फ 15 किलोमीटर तक रह गया है। ऐसे में अगर कोई उन्हें ईरिक्शा यानी टोटो का सहयोग कर सकें तो वो फिर से 100 किलोमीटर तक इस भीषण गर्मी में पानी का वितरण कर पाएंगे। प्रचंड गर्मी में हाथ से ठेला खींचकर मटकों में पानी भरना आसान नहीं है, लेकिन ये कपल इसे अपना धर्म और कर्तव्य समझकर कर रहा है। सुबह के 4 बजे वे अपने हथठेले को लेकर घर से निकल पड़ते हैं।
घनश्याम और शशि लता के तीन बच्चे हैं- दो बेटे और एक बेटी। पति और पत्नी, दोनों के पास सरकारी जॉब कार्ड हैं, लेकिन पूरे साल काम की कोई गारंटी नहीं है। गर्मी के सबसे कठिन चार महीनों में, जब कुओं में पानी कम हो जाता है और मजदूरों को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तो वे अपना पूरा दिन उनकी प्यास बुझाने में लगा देते हैं। पूरे जिले में धनश्याम की पहचान मटका मैन के रूप में होती है। लोग इस कपल की तारीफ करते नहीं थकते। ऐसे समय में जब स्वार्थी हो गए हैं धनश्याम और उनकी पत्नी मानवता की एक मिसाल पेश कर रहे हैं।
Updated on:
15 May 2026 05:39 pm
Published on:
15 May 2026 04:48 pm
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