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उत्तराखंड में बढ़ रहा भूतों का बसेरा, 10 साल में करीब सवा लाख लोगों ने छोड़े अपने घर

उत्तराखंड में बढ़ रहा भूतों का बसेरा, 10 साल में करीब सवा लाख लोगों ने छोड़े अपने घर

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उत्तराखंड में बढ़ रहा भूतों का बसेरा, 10 साल में करीब सवा लाख लोगों ने छोड़े अपने घर

देरहादून। भूतों के बारे में तो आपने कई बार सुना होगा। भूतों के घर या गांव के बारे में भी आपको जानकारी होगी। लेकिन क्या आपको पता कि देश के एक राज्य में एक-दो नहीं बल्कि 700 ऐसे गांव हैं जो भूतिया हैं। यकीन नहीं आता तो इस खबर में जानिए कैसे उत्तर भारत के एक राज्य उत्तराखंड में सैकड़ों गांव भूतिया बन गए हैं। पिछले 10 साल में 700 गांव खाली हो चुके हैं और करीब 1.19 लाख लोगों ने घर छोड़ दिया।


बढ़ता जा रहा भूतों का बसेरा
देव भूमि उत्तराखंड इससे देखने और यहां घूमने हर साल लाखों देशी और विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। इसे भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है, लेकिन धीरे-धीरे यहां भूतों का बसेरा बढ़ता जा रहा है। कभी इंसानों से और हलचल से भरे उत्तराखंड के गांवों में अब कोसो दूर तक विराना पसरा रहता है। क्योंकिं इस गांव में इंसान नही बल्की भूत रहतें हैं। इन्हें भूतो का गांव भी कहा जाता है।

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दरअसल उत्तराखंड में सदियों से सर्दियों के मौसम में केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के इलाकों में रहने वाले लोग कम ऊंचाई पर आ जाते रहे हैं। बाद में मौसम बदलने पर वे वापस अपने गांवों को चले जाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से सर्दियों के बाद भी कुछ गांवों में लोग नहीं लौट रहे हैं। लोगों के गांव खाली कर देने की वजह से उत्तराखंड में लोग इन्हें भूतियां गांव कहने लगे हैं।


सीएम भी जता चुके चिंता
उत्तरखंड सरकार ने आबादी के पलायन को लेकर पिछले साल पलायन आयोग बनाया था। आयोग के उपाध्यक्ष एसएस नेगी का कहना है कि पिछले 10 साल में 700 गांव खाली हो चुके हैं और करीब 1.19 लाख लोगों ने घर छोड़ दिया। 50 फीसदी लोगों ने जीवनयापन के लिए अपने गांवों को छोड़ दिया, जबकि आधे लोग खराब शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से गांव नहीं लौटे। प्रदेश के सीएम त्रिवेंद्र रावत भी इसको लेकर चिंता जता चुके हैं।

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इसलिए घर छोड़ रहे ग्रामीण
बताया जाता है कि पलायन करने वाले 70 फीसदी लोग राज्य में ही एक जगह से दूसरी जगह चले गए। उत्तराखंड में लोग इन खाली पड़े गांवों को भूतिया गांव कहते हैं। 2011 और 2017 की जनगणना के मुताबिक, 734 गांवों में एक भी लोग नहीं मिले, जबकि 565 गांवों में आधे लोग ही थे। ज्यादातर लोग मूलभूत सुविधाओं की कमी की वजह से गए। कई गांव बॉर्डर पर हैं जिसकी वजह से लोगों में चिंता भी होती है।


भूतिया फेस्टिवल किया आयोजित
उत्तराखंड के खाली होते गांवों की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए पिछले वर्ष यहां अनोखा फेस्टिवल आयोजित किया था। स्वयंसेवी संस्था हंस फाउंडेशन की मदद से हुए इस फेस्टिवल में गाना-बजाना, पहाड़ी खाना, मिलना-मिलाना सब कुछ था। इनकी कोशिश थी कि कुछ ऐसा हो कि लोग भले ही स्थायी रूप से यहां न रहें, लेकिन अपने पुस्तैनी घरों को यूं उजाड़ न छोड़ें। इनकी मरम्मत कराएं, समय-समय पर इन्हें संवारें।