गांधी की हत्या में यह दूसरा शख्स भी था शामिल, 15 नवंबर को नाथूराम गोडसे के साथ दी गई थी फांसी

महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में नाथूराम गोडसे को अंबाला जेल में फांसी पर लटकाया गया था।

नई दिल्ली। आजाद भारत में 15 नवंबर का दिन बहुत ही अहम है। क्योंकि इस दिन दो ऐसे लोगों को फांसी पर लटकाया गया था जिसको मानने वाले आज भी दबी जुबान उनपर गर्व करते हैं। दरअसल पूरी दुनिया यह जानती है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, लेकिन उनके साथ एक और शख्स था जिनके बारे में शायद दुनिया कम ही जानती है। हम आज उस दूसरे शख्स के बारे में आपको बताएंगे जिन्हें महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में नाथूराम गोडसे के साथ अंबाला जेल में फांसी पर लटकाया गया था।

नारायण आप्टे ने मारी थी चौथी गोली

बता दें कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले दूसरे शख्स का नाम नारायण दत्तात्रेय आप्टे था। ऐसा माना जाता है कि गांधी जी पर चार गोलियां चलाई गई थी। इसमें से तीन नाथूराम गोडसे ने मारी थी जबकि चौथी गोली आप्टे ने चलाई थी। इस संबंध में कुछ समय पहले अभिनव भारत मुंबई के प्रमुख डॉक्टर पंकज फडनिस कहा था कि आप्टे ब्रिटिश खुफिया एजेंसी फोर्स 136 का सदस्य था। गांधी की हत्या मामले में जांच के लिए जब 1966 में सरकार ने फाइल खोली और जस्टिस जेएल कपूर की अगुवाई में जांच कमीशन का गठन किया गया। जांच के बाद जब इसकी रिपोर्ट सामने आई तो उसमें आप्टे की पहचान को लेकर शक जाहिर किया गया और कहा गया कि वे भारतीय वायुसेना में भी रह चुके हैं। जबकि इसी रिपोर्ट के आधार पर अभिनव भारत ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर से कुछ समय पहले जानकारी मांगी तो कहा गया कि आप्टे कभी भी एयरफोर्स में नहीं रहे। हालांकि फडनीस का कहना है कि आप्टे शर्तिया तौर ब्रिटिश एजेंट था और गांधी की हत्या में ब्रिटिश साजिश का हिस्सा था।

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कौन है नारायण दत्तात्रेय आप्टे

आपको बता दें कि नारायण दत्तात्रेय आप्टे का जन्म 1911 में हुआ था एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि वह एक आकर्षक प्रतिभा का धनी व्यक्ति था। इनके परिवार का पुणे में संस्कृत विद्वानों के ब्राह्मण परिवार के रूप में धाक थी। उसने बॉम्बे विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद कई तरह के काम किए। कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब वीर सावरकर ने हिन्दू महासभा के लोगों से अंग्रेजों की मदद के लिए अपील की तो इस दौरान आप्टे सेना का रिक्रूटर बन गए और बाद में अस्थाई तौर पर फ्लाइट लेफ्टिनेंट भी बना। ऐसा बताया जाता है कि आप्टे ने 1939 में अहमदनगर में टीचर की नौकरी करते हुए खुद को हिंदू महासभा के साथ जोड़ा था। हालांकि बाद में अपने परिवार की देखभाल के लिए वापस लौट आए थे।

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हिन्दू राष्ट्र नाम से निकालते थे अखबार

आपको बता दें कि आप्टे एक हिन्दू विचारधारा के व्यक्ति थे। नाथूराम गोडसे से प्रभावित हुए और बाद में गोडसे अग्रणी नाम से अखबार निकालने लगे, जो कि हिन्दू विचारधारा को आगे बढ़ाते थे। यह अखबार के निशाने पर हमेशा कांग्रेस रहती थी। कुछ समय बाद आर्थिक बदहाली के कारण अखबार बंद होने के कगार पर पहुंच गया। हालांकि वीर सावरकर आर्थिक मदद करते रहते थे। लेकिन आजादी के बाद समय बदला और सरकार ने आपत्तिजनक बताते हुए अखबार को बंद कर दिया। बाद में आप्टे ने हिन्दू राष्ट्र नाम से एक बार फिर अखबार शुरु की। गांधी के हत्या के बाद जब वे जेल में बंद थे तो उस दौरान वह एक आदर्श कैदी के तौर पर जाने जाते थे। इस बात का खुलासा राबर्ट पेन की गांधी की जीवन द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी में की गई है। आप्टे ने जेल में बंद रहते हुए भारतीय चिंतन पर एक किताब भी लिखी थी।

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15 नवंबर को दी गई थी फांसी

आपको बता दें कि गांधी की हत्या के आरोप में नाथूराम गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे को अंबाला जेल में फांसी दी गई थी। कहा जाता है कि जब उन्हें फांसी के फंदे तक ले जाया जा रहा था तो उस दौरान गोडसे अखंड भारत का नारा लगा रहे थे तो आप्ट अमर रहे कहते हुए उसके आवाज को बल दे रहे थे।

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Anil Kumar
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