
RSS woman
नई दिल्ली। राहुल गांधी ने गुजरात में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में महिलाओं की भूमिका पर सवाल उठाकर एक दशकों पुरानी बहस को नए सिरे से जीवित कर दिया है। 92 साल पहले गठित हुए देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन में महिलाओं की हिस्सेदारी न होना एक बड़ा सवाल है, लेकिन ऐसा नहीं है कि यह सवाल आज ही सामने आया है। असल में संघ की स्थापना के साथ ही इसके प्रमुख पदाधिकारियों के सामने यह सवाल आ गया था। लेकिन संघ के नेताओं ने अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं दी।
एक दशक बाद ही बन गया अलग संगठन
संघ की स्थापना के बाद महाराष्ट्र में इसका प्रसार शुरू हुआ और एक महाराष्ट्रीयन महिला लक्ष्मीबाई केलकर के बेटे भी संघ से जुड़े। बेटों के माध्यम से लक्ष्मीबाई भी संघ के कार्यों के प्रति आकर्षित हुईं और उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से मुलाकात की। उन्होंने डॉ हेडगेवार से संघ में काम करने की इच्छा जाहिर की, लेकिन डॉ. हेडगेवार ने उन्हें बताया कि संघ में स्त्रियां नहीं आतीं। तब लक्ष्मीबाई केलकर ने 1936 में स्त्रियों के लिए 'राष्ट्र सेविका समितिÓ नामक नया संगठन बनाया। 1945 में इसका पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। यह संगठन फिलहाल दुनिया के 25 देशों में सक्रिय है।
संघ का अनुषंगी नहीं, स्वतंत्र संगठन है राष्ट्र सेविका समिति
अक्सर राष्ट्र सेविका समिति को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की महिला शाखा समझ लिया जाता है, जबकि ऐसा है नहीं। यह पूरी तरह से स्वतंत्र संगठन है और यह संघ की विचारधारा के अनुरूप भले ही काम करता है, लेकिन इसका संघ से सीधे तौर पर कोई वास्ता नहीं है। फिलहाल वी. शांता कुमारी इसकी प्रमुख संचालिका हैं, जबकि सीता आनंदम इसकी प्रमुख कार्यवाहिका हैं।
मौसीजी के नाम से मशहूर थीं लक्ष्मीबाई केलकर
राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना करने वाली लक्ष्मीबाई को संगठन की सदस्या 'वन्दनीया मौसीजीÓ कहती थीं। जानकारी के मुताबिक, मौसीजी का जन्म 6 जुलाई, 1905 को नागपुर में हुआ था और उनका शुरुआती नाम कमल नामक था। 14 साल की उम्र में उनका विवाह वर्धा के एक विधुर वकील पुरुषोत्तमराव केलकर से हुआ। पुरुषोत्तमराव की पहले विवाह से दो बेटियां थीं। शादी के बाद बालिका कमल का नाम लक्ष्मीबाई हो गया।
लड़कियों के लिए खोला स्कूल, रूढिय़ों के थीं खिलाफ
लक्ष्मीबाई अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए घर पर एक शिक्षक बुलाती थीं। इस परेशानी को देखते हुए उन्होंने बालिका शिक्षा के प्रचार के लिए एक बालिका विद्यालय भी खोला। लक्ष्मीबाई के बारे में एक किस्सा मशहूर है। वे गांधी जी से काफी प्रभावित थीं। उन्होंने इसी के चलते घर में चरखा भी मंगाया था। एक बार जब गांधी जी ने एक सभा में दान की अपील की, तो लक्ष्मीबाई ने अपनी सोने की जंजीर दान कर दी थी।
Published on:
10 Oct 2017 10:13 pm
बड़ी खबरें
View Allविविध भारत
ट्रेंडिंग
