
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Photo: IANS)
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय के लिए नौकरियों और शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले पर जवाब मांगा है। गुरुवार को अदालत ने इस मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है और तीन सप्ताह के भीतर हलफनामे के माध्यम से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति आर.आई. छागला और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने अधिवक्ता सैयद एजाज अब्बास नकवी द्वारा दायर याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में राज्य के सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग द्वारा 17 फरवरी 2026 को जारी उस सरकारी आदेश (GR) को चुनौती दी गई है, जिसमें मुस्लिम आरक्षण को 'असंवैधानिक' और समुदाय के हितों के खिलाफ बताकर रद्द कर दिया गया था। अदालत ने अब मामले की अगली सुनवाई के लिए अगले महीने 4 मई की तारीख तय की है।
यह याचिका अधिवक्ता सैयद एजाज अब्बास नकवी द्वारा दाखिल की गई है। इसमें महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग द्वारा 17 फरवरी को जारी सरकारी आदेश (GR) को चुनौती दी गई है। अधिवक्ता नकवी ने अपनी याचिका में सरकार के इस फैसले को नस्ली भेदभाव करार दिया है।
याचिका में दावा किया गया है कि सरकार अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव कर रही है, जो संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। इसमें कहा गया है कि आरक्षण खत्म करने के सरकार के फैसले के पीछे कोई ठोस या उचित कानूनी तर्क मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ता के अनुसार, पाले सरकार ने मुस्लिम समुदायों को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग माना था।
मुस्लिम आरक्षण का यह कानूनी विवाद काफी पुराना है। जुलाई 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मराठा समुदाय के लिए 16% और मुसलमानों के लिए 5% आरक्षण की घोषणा की थी। तब इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसके बाद कोर्ट ने नौकरियों में आरक्षण पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन शिक्षण संस्थानों में 5% मुस्लिम आरक्षण को बरकरार रखा था।
इस बीच, 17 फरवरी को देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने एक नया जीआर (GR) जारी कर मुसलमानों के लिए नौकरियों और शिक्षा में पिछले सभी अध्यादेशों और फैसलों को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया। फडणवीस सरकार द्वारा जारी आदेश में साफ कहा गया था कि मुस्लिम समुदाय को 5 प्रतिशत आरक्षण देने का 23 दिसंबर 2014 का निर्णय प्रभावी नहीं होगा।
दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार ने आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मराठा और मुस्लिम आरक्षण पर बड़ा फैसला लिया था। तब सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठा समुदाय को 16% और मुस्लिम समुदाय को 5% आरक्षण देने की घोषणा की गई थी। जिससे राज्य में कुल आरक्षण का कोटा 73% तक पहुंच गया था। तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नसीम खान ने मंत्रिमंडल की बैठक में मुस्लिम समुदाय को 5% आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा था, जिसे सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई थी। हालांकि, कानूनी पेचीदगियों और सत्ता परिवर्तन के बाद यह निर्णय अधर में लटका हुआ था।
अब महाराष्ट्र सरकार को तीन हफ्ते के भीतर अदालत को यह समझाना होगा कि किन आधारों पर मुस्लिम आरक्षण को रद्द किया गया है। इसलिए अब सबकी नजर महाराष्ट्र सरकार के जवाब पर टिकी है। 4 मई को होने वाली अगली सुनवाई में यह साफ हो सकता है कि अदालत मुस्लिम आरक्षण पर क्या रुख अपनाती है।
Updated on:
02 Apr 2026 06:22 pm
Published on:
02 Apr 2026 06:15 pm
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