
Bombay High Court
महाराष्ट्र के नासिक से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और दिल दहला देने वाले मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मुख्य आरोपी विलास महाले को सुनाई गई फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने गौर किया कि आरोप तय करने से लेकर महत्वपूर्ण गवाहों की जांच तक, आरोपी के पास कोई वकील नहीं था।
सात साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में नासिक की विशेष पॉक्सो अदालत ने विलास को दोषी ठहराया था और उसे फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने पूरे मामले की सुनवाई दोबारा करने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि निचली अदालत ने आरोपी को अपनी बात रखने और उचित कानूनी सहायता पाने का पूरा अवसर नहीं दिया, जो कि न्याय प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इसी वजह से अब यह मामला फिर से शुरुआती स्तर से चलाया जाएगा।
अदालत ने निर्देश दिया है कि नए सिरे से ट्रायल शुरू करते समय यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी आरोपियों को उचित कानूनी प्रतिनिधित्व मिले। जरूरत पड़ने पर जिला विधी सेवा प्राधिकरण के जरिए वकील उपलब्ध कराया जाए। साथ ही सरकारी पक्ष को पहले के गवाहों की दोबारा गवाही दर्ज करने और नए गवाह पेश करने की भी अनुमति दी गई है।
यह मामला नासिक जिले के एक गांव का है, जहां सात साल की बच्ची को आरोपी विलास महाले ने बहाने से अपने पास बुलाया। उसने बच्ची से तंबाकू मंगवाया और फिर उसे कमरे में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद तार से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। आरोपी ने शव को छिपाने के लिए उसे एक कोने में रखकर ऊपर से टोकरी और कचरा डाल दिया और कमरे को बंद कर फरार हो गया।
जब बच्ची की मां और दादी उसे खोज रही थीं, तब आरोपी ने उन्हें गुमराह करने की कोशिश की। बाद में संदेह होने पर गांववालों ने कमरे का ताला तोड़ा, जहां बच्ची का शव मिलने से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई।
इस मामले में मुख्य आरोपी विलास महाले फिलहाल जेल में है, जबकि दो अन्य आरोपी जमानत पर हैं। हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी आरोपियों को 6 अप्रैल को अदालत में पेश किया जाए और इसके बाद ट्रायल बिना किसी पूर्व निर्णय के प्रभाव में केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर चलाया जाए। अदालत ने यह भी कहा है कि कोशिश की जाए कि पूरा मामला 10 महीने के भीतर निपटाया जाए।
खंडपीठ ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर किसी आरोपी को उसका कानूनी अधिकार नहीं दिया जाता, तो यह न्याय प्रक्रिया के साथ गंभीर अन्याय है। अदालत ने यह भी माना कि अपराध अत्यंत गंभीर है और सुनवाई तेज होनी चाहिए थी, लेकिन इसके लिए न्याय के सिद्धांतों की बलि नहीं दी जा सकती। निचली अदालत ने उसे अपना बचाव करने का मौका दिए बिना ही फैसला सुना दिया।
करीब नौ साल बीत जाने के बावजूद पीड़ित परिवार को अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है। अब दोबारा ट्रायल के आदेश के बाद परिवार को फिर से गवाही और जिरह की कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा, जिससे उनकी पीड़ा एक बार फिर ताजा हो गई है।
Updated on:
25 Mar 2026 04:32 pm
Published on:
25 Mar 2026 04:23 pm
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