
Sumit Jha Resignation Video :डीसीपी सुमित झा के फर्जी वीडियो पर कार्रवाई, AI जनित क्लिप की जांच शुरू (फोटो सोर्स:@@DelhiPolice)
DCP Sumit Jha Deepfake: आज के दौर में सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर तस्वीर और सुनाई देने वाली हर आवाज सच हो, यह जरूरी नहीं। तकनीक के इस जमाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जितनी हमारी सहूलियत बढ़ा रही है, उतनी ही यह राष्ट्र की सुरक्षा और सामाजिक शांति के लिए एक नया हथियार भी बनती जा रही है। इसका ताजा और खौफनाक उदाहरण हाल ही में देखने को मिला, जब दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी का तथाकथित "इस्तीफे वाला वीडियो" इंटरनेट पर आग की तरह फैल गया।
इस वायरल वीडियो में दिल्ली पुलिस के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) सुमित झा यह कहते हुए सुनाई दे रहे थे कि वे अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे रहे हैं। वीडियो में एआई के जरिए उनके चेहरे और आवाज को इस तरह ढाला गया था मानो वे कह रहे हों कि सरकार उन पर प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ झूठे बयान देने और उन्हें फंसाने का दबाव बना रही है। वीडियो में डीसीपी को यह कहते हुए दिखाया गया, "ये छात्र आतंकवादी नहीं हैं, देश का भविष्य हैं… मैं झूठ का हिस्सा नहीं बन सकता।"
जैसे ही यह क्लिप एक्स (ट्विटर) और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर पहुंची, इसने राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया। कई नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने बिना किसी पड़ताल के इसे शेयर करना शुरू कर दिया, जिससे आम जनता के बीच भ्रम और आक्रोश की स्थिति पैदा हो गई।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार की फैक्ट-चेक एजेंसी (PIB) तुरंत हरकत में आई। जांच में यह साफ हो गया कि यह वीडियो पूरी तरह से एआई-जनरेटेड डीपफेक है।
असली वीडियो दरअसल डीसीपी सुमित झा का ही था, लेकिन उसमें वे एक गंभीर सुरक्षा मामले पर बात कर रहे थे। मूल वीडियो में वे बता रहे थे कि कैसे पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल्स छात्र आंदोलनों की आड़ में भारत में अस्थिरता और उपद्रव फैलाने की कोशिश कर रहे थे। जालसाजों ने इसी असली वीडियो की ऑडियो और लिप-सिंक (Lip-sync) को बदलकर इसे 'इस्तीफे का नाटक' बना दिया ताकि देश में प्रशासनिक व्यवस्था और सरकार के खिलाफ आक्रोश भड़काया जा सके।
इस फर्जीवाड़े की खबर सामने आते ही कानूनी शिकंजा भी कसना शुरू हो गया है। बीजेपी की सोशल मीडिया टीम के सदस्य निखिल भामरे की शिकायत के आधार पर महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।
पुलिस ने इस मामले में:
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 (सार्वजनिक रूप से उपद्रव फैलाने वाले बयान देना)
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 66D (पहचान बदलकर धोखाधड़ी करना)
के तहत केस दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि बिना किसी पुष्टि के सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने और जनता के मन में अविश्वास पैदा करने के मकसद से इस तरह के फर्जी कंटेंट को फैलाना एक गंभीर अपराध है।
यह कोई पहली घटना नहीं है जब डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल समाज में अस्थिरता या किसी की छवि खराब करने के लिए किया गया हो।
बीते कुछ समय से चुनावी माहौल में नेताओं के फर्जी ऑडियो और वीडियो बनाकर मतदाताओं को भ्रमित करने के मामले तेजी से बढ़े हैं। कभी किसी अभिनेता का फर्जी राजनीतिक समर्थन वाला वीडियो वायरल होता है, तो कभी किसी नेता का फर्जी भाषण। डीपफेक अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह साइबर युद्ध और प्रोपेगैंडा का एक खतरनाक औजार बन चुका है।
भारत सरकार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे डीपफेक कंटेंट पर कड़ा पहरा रखें।
आईटी नियमों के अनुसार, यदि कोई यूजर या प्लेटफॉर्म इस तरह के डीपफेक या मॉर्फ्ड मीडिया को 24 से 36 घंटे के भीतर नहीं हटाता, तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
सरकार एआई कंटेंट के लिए 'वॉटरमार्किंग' (Watermarking) और लेबलिंग को अनिवार्य करने पर विचार कर रही है ताकि यूजर्स को तुरंत पता चल सके कि वीडियो असली है या एआई से बनाया गया है।
Updated on:
02 Aug 2026 12:38 pm
Published on:
02 Aug 2026 12:38 pm
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