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आर्थिक तंगी में भी पति को पत्नी को देना होगा गुजारा भत्ता, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

Bombay High Court: पति ने भरण-पोषण के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि उसने अपनी पत्नी को घर वापस लाने के कई प्रयास किए थे, लेकिन वह अभी भी अपना वैवाहिक घर (ससुराल) छोड़कर रह रही है।

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मुंबई

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Dinesh Dubey

Feb 17, 2023

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15 वर्षीय रेप पीड़िता को नहीं मिली गर्भपात की इजाजत, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

Mumbai News: बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने एक पारिवारिक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, आर्थिक तंगी से जूझ रहे पति को भी अपनी अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण के लिए भुगतान करना होगा। भले ही पति दावा करता है कि वह अलग रह रही पत्नी के साथ रहने के लिए तैयार है, फिर भी वह सीआरपीसी (CrPC) की धारा 125 के तहत पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए उत्तरदायी होगा।

जस्टिस भारती डंगरे (Bharati Dangre) ने पति की याचिका को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने एक पारिवारिक अदालत (Family Court) के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे पत्नी और उसके दो बच्चों को 18,000 रूपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया था। यह भी पढ़े-Non Veg Advertisement: ‘...तो टीवी बंद कर दो’, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठुकराई नॉन वेज विज्ञापन बैन करने की याचिका

पति ने भरण-पोषण के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि उसने अपनी पत्नी को घर वापस लाने के कई प्रयास किए थे, लेकिन वह अभी भी अपना वैवाहिक घर (ससुराल) छोड़कर रह रही है। कोर्ट ने इस मामले में नौ फरवरी को आदेश पारित किया था।

पत्नी ने दावा किया था कि पति ने उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी और इस वहज से वह ससुराल छोड़ने और अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए मजबूर हो गई।

जबकि पति ने तर्क दिया कि वह पहले से ही आर्थिक नुकसान में है और उसने 15 लाख रूपये उधार भी लिए है, जिसे अभी तक चुकाया नहीं गया है। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ थी। महिला का मामला उसके पति की तरह नहीं है कि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र कमाई है।

जस्टिस भारती डंगरे ने कहा "भले ही वह (पति) आर्थिक तंगी की स्थिति में हो, वह अपनी पत्नी के साथ-साथ अपने बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। चूंकि पति ने भरण-पोषण की राशि व शैक्षिक खर्चों के प्रति अपनी देनदारी पर विवाद नहीं किया है। पत्नी का भरण-पोषण करना उसका नैतिक और कानूनी दायित्व है जो स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है।“