
भारतीय शहरों में ‘साइकिल टू वर्क’ मॉडल क्यों फेल? (Photo: IANS)
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और ईंधन आपूर्ति की चिंताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से ईंधन की खपत कम करने की अपील की है। उन्होंने वर्क फ्रॉम होम, कारपूलिंग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने की बात कही। इसके बाद पेट्रोल-डीजल और सीएनजी गैस की कीमत बढ़ी, जिसके बाद हर कोई आम आदमी की जेब पर बढ़ते बोझ पर चिंता जाता रहा है। लेकिन इस पूरे परिदृश्य में उस ‘साइकिल’ की बात कोई नहीं कर रहा, जो न केवल ईको-फ्रेंडली ट्रांसपोर्ट का सबसे बेहतर जरिया है, इस्तेमाल करने वालों की सेहत को भी संवारता है।
सवाल यह है कि जब भारत के कई शहरों में पिछले एक दशक में साइकिल ट्रैक बनाए गए, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स में ग्रीन कॉरिडोर तैयार हुए और कोविड के दौरान पॉप-अप लेन तक बनाई गईं, तो फिर ऑफिस आने-जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल आम क्यों नहीं हो पाया?
एक समय था जब भारतीय शहरों में साइकिल रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थी। मुंबई, पुणे, लखनऊ, भोपाल और कई छोटे शहरों में स्कूल, कॉलेज और फैक्ट्रियों के बाहर साइकिल स्टैंड भरे रहते थे। लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद तस्वीर बदल गई।
पहले स्कूटर, फिर बाइक और कार भारतीय परिवारों के लिए ‘स्टेटस सिंबल’ बन गए। साइकिल धीरे-धीरे जरूरत से हटकर या तो फिटनेस का साधन बन गई या फिर उसे गरीबों की सवारी समझा जाने लगा।
भारत के ज्यादातर बड़े शहरों में साइकिल ट्रैक तो बनाए गए हैं, लेकिन उन्हें एक नेटवर्क की तरह विकसित नहीं किया गया। कहीं कुछ किमी ट्रैक बना है और फिर अचानक खत्म हो जाता है। कई जगह ट्रैक सीधे तेज ट्रैफिक में मिल जाते हैं। तो कहीं साइकिल ट्रैक पर ही अतिक्रमण कर लिया गया है।
मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और गुरुग्राम जैसे शहरों में करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन ऑफिस तक सुरक्षित और लगातार जुड़ा हुआ रूट तैयार नहीं हो पाया। यही वजह है कि लोग वीकेंड पर तो साइकिल चलाते हैं, लेकिन रोज ऑफिस जाने के लिए उस पर भरोसा नहीं करते।
भारतीय सड़कों पर साइकिल चलाना आज भी जोखिम भरा माना जाता है। बसें, तेज रफ्तार बाइक, अवैध पार्किंग और अव्यवस्थित ट्रैफिक साइकिल चालकों के लिए खतरा बनते हैं। सफर में कई तरह की बाधाएं लाते हैं।
महिलाओं के लिए यह चिंता और ज्यादा बड़ी है। उन्हें लगता है कि कार, ऑटो या मेट्रो की तुलना में साइकिल पर सफर ज्यादा असुरक्षित है। खासकर रात या सुनसान इलाकों में यह डर और बढ़ जाता है।
कई शहरों में साइकिल ट्रैक पार्किंग, ठेले, कचरा या बाइक के शॉर्टकट में बदल चुके हैं। ऐसे में नौकरीपेशा लोग चाहकर भी काम पर जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। जब ट्रैक ही साफ और सुरक्षित नहीं होंगे तो कोई रोजाना उस रास्ते से ऑफिस क्यों जाएगा?
दिल्ली की गर्मी, चेन्नई की उमस या मुंबई का मानसून साइकिल से सफर को मुश्किल बना देता है। हालांकि सिर्फ मौसम को दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि एशिया के कई गर्म देशों में भी बड़ी संख्या में लोग साइकिल इस्तेमाल करते हैं। यहां मुद्दा केवल मौसम नहीं, बल्कि सहायक सुविधाओं का अभाव है।
भारत की भीषण गर्मी और उमस को भी एक बड़ी बाधा माना जाता है। चेन्नई की नमी या दिल्ली की तपती धूप में 8-10 किलोमीटर साइकिल चलाकर ऑफिस पहुंचना थकाऊ होता है। हालांकि, मुद्दा केवल मौसम नहीं, बल्कि सुविधाओं का अभाव है।
असल समस्या यह है कि भारतीय शहरों और ऑफिसों में वह सुविधाएं नहीं हैं जो साइकिलिंग को आसान बनाती हैं। जैसे शेड वाले रास्ते, सुरक्षित पार्किंग, चेंजिंग रूम और लॉकर।
मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में ऑफिस तक पहुंचने के लिए 10-15 किमी का सफर करना आम बात होती है, क्योंकि जहां ऑफिस है, उस जगह पर घर लेकर रहना हर कोई अफोर्ड नहीं कर सकता है। जबकि 'साइकिल टू वर्क' कल्चर में सबसे आगे माने जाने वाले यूरोपीय देशों में ऐसा नहीं है।
भारत के ज्यादातर कॉरपोरेट ऑफिस इस सोच के साथ बने हैं कि कर्मचारी बाइक, कार या फिर मेट्रो जैसे किसी अन्य सार्वजनिक परिवहन से आएंगे। इस सूची में साइकिल शामिल नहीं होता। इसलिए अगर कोई साइकिल से पहुंचे तो उसके लिए पार्किंग, कपड़े बदलने या फ्रेश होने की सुविधा तक नहीं होती।
यही कारण है कि फिटनेस और पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद भारत में ‘साइकिल टू वर्क’ कल्चर अभी भी बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो पाया है। जब तक शहर, सड़कें और ऑफिस मिलकर इसे आसान और सुरक्षित नहीं बनाएंगे, तब तक साइकिल ट्रैक बनते रहेंगे, लेकिन उन पर ऑफिस जाने वाले लोग कम ही नजर आएंगे।
Updated on:
15 May 2026 03:34 pm
Published on:
15 May 2026 03:29 pm
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