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महाराष्ट्र के सत्ता संघर्ष पर आया ‘सुप्रीम’ फैसला, बनी रहेगी शिंदे-फडणवीस सरकार, गवर्नर को फटकारा

Supreme Court Verdict on Shiv Sena: शीर्ष कोर्ट ने महाराष्ट्र के 16 विधायकों की अयोग्यता का मामला सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच को सौंप दिया है। मालूम हो कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की बगावत के कारण जून 2022 में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली MVA सरकार गिर गई थी। इसके बाद शिंदे ने बीजेपी के साथ गठबंधन करके सरकार का गठन किया था।

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मुंबई

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Dinesh Dubey

May 11, 2023

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शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता मामले में SC ने विधानसभा स्पीकर को भेजा नोटिस

Maharashtra Political Crisis: महाराष्ट्र के सत्ता संघर्ष पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने आखिरकार अपना फैसला सुना दिया है। शीर्ष कोर्ट ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को बड़ी राहत देते हुए शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता के मामले पर स्पीकर को फैसला लेने का निर्देश दिया है। हालांकि कोर्ट ने पूर्व गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी और स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसले पर कड़ी टिप्पणी की है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नाबाम रेबिया केस को बड़ी बेंच को सौंप दिया है। माना जा रहा था कि एकनाथ शिंदे समेत शिवसेना के 16 विधायकों के अयोग्य घोषित होने के बाद सीएम शिंदे को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है और महाराष्ट्र की शिंदे-फडणवीस सरकार बरकरार रहेगी।

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे नीत शिवसेना के 16 विधायकों को अयोग्य घोषित करने का अनुरोध करने वाली याचिका समेत सुप्रीम कोर्ट ने पांच महत्वपूर्ण याचिकाओं पर निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि विधायक प्रावधानों का दुरुपयोग कर रहे है। इसलिए महाराष्ट्र मामले में उठे नाबाम रेबिया केस को सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच को सौंपा जायेगा। हालांकि इस पर सुनवाई से महाराष्ट्र मामले पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह भी पढ़े-Maharashtra: 16 विधायकों के अयोग्य होने पर भी रहेगी शिंदे-फडणवीस सरकार? अजित पवार ने समझाया सियासी गणित

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि स्पीकर को अयोग्यता याचिकाओं पर उचित समय के भीतर फैसला करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि यथास्थिति बहाल नहीं की जा सकती क्योंकि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं किया और मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव ठाकरे को राहत देने से इनकार कर दिया और कहा कि उन्होंने फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं किया।

साथ ही शीर्ष कोर्ट ने माना कि महाराष्ट्र के राज्यपाल का निर्णय भारत के संविधान के अनुसार नहीं था। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि राज्यपाल के पास ऐसा कोई संचार नहीं था जिससे यह संकेत मिले कि असंतुष्ट विधायक एमवीए सरकार से समर्थन वापस लेना चाहते थे। राज्यपाल ने शिवसेना के विधायकों के एक गुट के प्रस्ताव पर भरोसा करके यह निष्कर्ष निकाला कि उद्धव ठाकरे अधिकांश विधायकों का समर्थन खो चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि आंतरिक पार्टी के विवादों को हल करने के लिए फ्लोर टेस्ट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। न तो संविधान और न ही कानून राज्यपाल को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने और अंतर-पार्टी या अंतर-पार्टी विवादों में भूमिका निभाने का अधिकार देता है।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि शिंदे गुट के भरत गोगावले को शिवसेना पार्टी के मुख्य सचेतक के रूप में नियुक्त करने का स्पीकर का फैसला अवैध था। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि स्पीकर को राजनीतिक दल द्वारा नियुक्त व्हिप को ही मान्यता देनी चाहिए।

संविधान पीठ जून 2022 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के बाद प्रतिद्वंद्वी शिवसेना समूहों द्वारा दायर याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया। पिछले साल अगस्त में शीर्ष अदालत की तीन जजों की पीठ ने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के संबंध में शिवसेना के प्रतिद्वंद्वी समूहों- एकनाथ शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे गुट द्वारा दायर याचिकाओं को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजा था। तब से ही शिवसेना के दोनों धड़ों द्वारा दायर की गई विभिन्न याचिकाएं शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित थी।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा में 30 जून को फ्लोर टेस्ट के लिए हरी झंडी दी थी। तब कोर्ट ने 30 जून को सदन के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र के राज्यपाल के निर्देश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत के आदेश के बाद उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

गौरतलब हो कि जून 2022 में एकनाथ शिंदे और उनके सहयोगी विधायकों ने बगावत कर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली त्रिपक्षीय महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था. इसके बाद शिंदे के नेतृत्व में बीजेपी के समर्थन से महाराष्ट्र में नई सरकार गठित की, जिसमें एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद शिंदे समूह ने शिवसेना पर दावा ठोका और खुद को असली शिवसेना बताते हुए चुनाव आयोग और देश की शीर्ष कोर्ट में क़ानूनी लड़ाई शुरू की। इस बीच, फरवरी में शिवसेना के चिन्ह और उस पर अधिकार को लेकर बड़ा फैसला आया। केंद्रीय चुनाव आयोग ने शिंदे नीत गुट को असली शिवसेना माना और पार्टी का ‘तीर धनुष’ का चुनाव चिन्ह उसे दे दिया।