
शिरडी में भय : महाराष्ट्र पुलिस में इतनी इंसानियत भी नहीं बची क्या?
- प्रहार : राजेश कसेरा
शिरडी के साईं दरबार में आस और श्रद्धा भाव लेकर दूर-दूर से आने वाले दर्शनार्थी गंभीर अपराध का शिकार बन रहे हैं। इस सच के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठा है। क्या उनमें इतनी भी इंसानियत नहीं बची कि श्रद्धालुओं के गुमशुदा परिजनों को तलाशने के लिए प्रयास करें। सिर्फ एक साल में शिरडीसे 88 लोग लापता हो गए और पुलिस के साथ सरकारी तंत्र के कान पर भी जूं तक रेंगी। किसी राजनीति दल के नेताओं और जिम्मेदार अधिकारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। यही तो मानवीय संवेदनाओं से भी खिलवाड़ करने का संगीन प्रकरण है। यह तो वह आंकड़ा है, जो आरटीआइमें सामने आया, कई मामले तो ऐसे होंगे, जो पुलिस तक आ ही नहीं पाए होंगे। उन परिवारों पर क्या बीत रही होगी, जिनके अपने उस पवित्र स्थान पर उनसे दूर हो गए, जहां हर उम्मीद को पूरा करने के लिए आस्तिक झोली फैलाकर आते हैं। अचानक उनका गायब हो जाना उनके लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं। शिरडी से लापता होने वाले लोगों में सबसे अधिक महिलाएं और मासूम बच्चे-बच्चियां शामिल हैं। इनको अपराधियों ने आसान शिकार माना और पुलिस की नाक के नीचे से जुर्म को अंजाम देकर छूमंतर हो गए।
Maharashtra Shirdi News : शिरडी दर्शनार्थी कैसे हो रहे एक-एक कर गायब! बांबे हाई कोर्ट ने कहा जांच करो
ऐसा कतई नहीं है कि पुलिस महकमे के भीतर बैठे कार्मिक भ्रष्ट या बेर्इमान हैं, पर कुछ तो हैं जिनकी सच्चाई शिरडी जैसे प्रकरणों से सामने आती है। कोई भी मानने को तैयार नहीं होगा कि शिरडी से इतने लोग गायब हो गए और पुलिस को भनक तक नहीं लगी। आखिर क्यों पुलिस को पीडि़तों का दर्द महसूस नहीं हुआ? कैसे तत्परता दिखाने में लापरवाही बरती गई? गायब हुए 88 लोगों में से एक को भी ढूंढा नहीं गया, इसका जवाब भी पुलिस को देना होगा। क्योंकि उसकी लापरवाही, हठधर्मिता और अनदेखी से आहत होकर ही इंदौर के एक पीडि़त व्यक्ति ने न्यायालय के समक्ष गुहार लगाई। उसने पुलिस के खिलाफ आवाज बुलंद की और इसी का परिणाम है कि मानव तस्करी जैसे भयावह अपराध के कारित होने का अंदेशा बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताया।
महाराष्ट्र पुलिस
देश के प्रतिष्ठित धर्म स्थल के आस-पास इस तरह से जुर्म का फलना-फूलना न सिर्फ उसकी प्रतिष्ठा पर आंच पहुंचाता है, बल्कि महाराष्ट्र पुलिस की वर्दी को भी दागदार करता है। जिस पुलिस के डर से भूत तक भाग जाते हैं, कोई चोर एक रुपए तक को चुराने की हिमाकत नहीं कर सकता, उसको मुट्ठीभर बदमाशों ने चुनौती देने का साहस दिखाया है। अब हाईकोर्ट का डंडा खाने के बाद पुलिस मुस्तैदी से काम करने का दावा करेगी। साख को बचाने के लिए दिन-रात एक कर देगी और संभव है कि पूरे रैकेट का भंड़ाफोड़ करने के लिए पूरी ताकत झोंक देगी।
हो सकता है, कई लोगों को उनके गुमशुदा परिजन भी मिल जाएं, पर जो पीड़ा वे पिछले कई वर्षों से झेल रहे हैं, उसका मर्म और मर्ज पुलिस कैसे लौटाएगी? कैसे और किन हालात में गुमशुदा लोगों का जीवन बीता, वो बुरे पल कब उनके दिलोदिगाम से निकल पाएंगे? उनके परिवारों ने जो अनमोल पल अपनों के बिना बिताए, उनका हिसाब कौन देगा? सवालों की सूची बहुत लंबी है, पर सबसे जरुरी काम गुमशुदा लोगों को उनके अपनों तक सकुशल पहुंचाने का है, जो महाराष्ट्र पुलिस को करना है। इसके साथ ही अपराधियों में भी ऐसा खौफ भरना होगा कि वे फिर से इस तरह का धृणित अपराध करने के बारे में सोचे तक नहीं। तब कहीं जाकर पुलिस के प्रति भरोसा बढ़ेगा।
Send Valuable feedback @
rajesh.kasera@epatrika.com
Published on:
16 Dec 2019 08:58 pm
बड़ी खबरें
View Allमुंबई
महाराष्ट्र न्यूज़
ट्रेंडिंग
