
शिवसेना के बाद एनसीपी में पड़ी फूट
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विभाजन के करीब दो सप्ताह बाद कल (14 जुलाई) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने कैबिनेट में फेरबदल किया और एनसीपी के वरिष्ठ नेता अजित पवार को वित्त मंत्रालय व योजना विभाग की जिम्मेदारी दी। इतना ही नहीं अजित दादा के साथ मंत्री पद की शपथ लेने वाले अन्य आठ एनसीपी नेताओं को भी उनके विभाग सौंप दिए गए। कुल मिलाकर एनसीपी से बने नए मंत्रियों को राज्य के दमदार मंत्रालय की कमान मिली है, जिसे बीजेपी की रणनीति का हिस्सा और शिंदे की शिवसेना के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है।
जून 2022 में एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना में विद्रोह हुआ, नतीजतन तत्कालीन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाडी (एमवीए) सरकार गिर गई। जिसके बाद शिंदे को बीजेपी ने महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया और पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री। वो भी तब जब बीजेपी के पास शिंदे गुट (40 विधायक) की तुलना में दोगुने से भी अधिक 105 विधायक थे। गौर करने वाली बात यह है कि 2014-19 में फडणवीस के मंत्रिमंडल में शिंदे मंत्री थे। यह भी पढ़े-अजित पवार को वित्त, धनंजय मुंडे को कृषि, महाराष्ट्र सरकार में 'दादा' के मंत्रियों को मिला दमदार मंत्रालय!
शिंदे गुट को नुकसान या फायदा?
इस राजनीति भूकंप के एक साल बाद 2 जुलाई को विपक्ष के नेता अजित पवार ने बगावत का बिगुल फूंकते हुए अपने चाचा शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी को विभाजित कर दिया और 8 अन्य पार्टी सहयोगियों के साथ खुद उपमुख्यमंत्री के रूप में शिंदे-फडणवीस सरकार में शामिल हो गए, जबकि बाकि 8 को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इसके साथ ही एनसीपी अजित पवार का गुट सत्ता में तीसरे साझेदार के तौर पर शामिल हो गया। इससे शिंदे के उन विधायकों को बड़ा झटका लगा, जो सालभर से कैबिनेट विस्तार होने पर मंत्री पद मिलने की उम्मीद लगाये बैठे थे। यह निराशा तब और बढ़ गई जब अजित और उनके एनसीपी सहयोगियों को वित्त, कृषि और सहकारिता जैसे वजनदार मंत्रालय आवंटित कर दिए गए।
दिलचस्प बात यह है शिंदे गुट कभी भी नहीं चाहता था कि अजित पवार महाराष्ट्र के वित्त मंत्री बने। क्योकि अजित एमवीए शासन में डिप्टी सीएम थे और वित्त विभाग उनके ही पास था। तब बगावत करने वाले शिवसेना विधायकों ने आरोप लगाया था कि अजित दादा फंड देने में पक्षपात करते थे। इसके बावजूद अजित पवार को वित्त विभाग सौंपा जाना शिंदे सेना के लिए चिंता का विषय बन गया है।
बीजेपी-शिवसेना और एनसीपी (अजित पवार गुट) में विभागों के बंटवारे को लेकर काफी खींचतान हुई। महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक कई बैठकें हुई। एक बात स्पष्ट है कि एनसीपी के शामिल होने से शिंदे के लोगों के लिए उपलब्ध सत्ता में हिस्सेदारी भी कम हो गई है। इसके अलावा मौजूदा सरकार में शिंदे खेमा का दबदबा कम होने का भी संकेत मिल रहा है।
पॉवर बैलेंस की आड़ में कतरे पर!
अजित पवार खेमे को विभाग आवंटित करते समय एकनाथ शिंदे के दो मंत्रियों के पंख भी कतरे गए हैं। विवादों में रहने वाले संजय राठौड (Sanjay Rathod) से खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) का प्रभार वापस ले लिया गया है और उन्हें मृदा एवं जल संरक्षण आवंटित किया गया है, जो कम वजन वाला विभाग माना जाता है। वहीँ, कई बार विवादों से सुर्ख़ियों में रहने वाले मंत्री अब्दुल सत्तार (Abdul Sattar) को कृषि से अल्पसंख्यक विकास विभाग में भेज दिया गया है।
इसी तरह, बीजेपी मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा (Mangal Prabhat Lodha) जो 'लव जिहाद' जैसे मुद्दों पर अपने बयानों के लिए विवादों में थे उनसे पर्यटन विभाग छीन लिया गया है। पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी अब बीजेपी नेता गिरीश महाजन (Girish Mahajan) को दी गई है और लोढ़ा का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एनसीपी नेता अदिति तटकरे को दिया गया है। निर्माण क्षेत्र के दिग्गज लोढ़ा के पास अब सिर्फ कौशल विकास और उद्यमिता का प्रभार है।
मालूम हो कि बीजेपी और उसकी सहयोगी शिंदे नीत शिवसेना के मंत्रिपरिषद में 10-10 कैबिनेट मंत्री हैं। 2 जुलाई को अजित पवार और आठ अन्य एनसीपी नेताओं के मंत्री बनने से महाराष्ट्र मंत्रिमंडल के कुल सदस्यों की संख्या बढ़ कर 29 हो गई है। राज्य में अधिकतम 43 मंत्री हो सकते हैं। यानी अभी भी मंत्रिपरिषद के बहुप्रतीक्षित विस्तार से 14 रिक्तियां शेष रह गई हैं।
अजित पवार की थी जरुरत?
पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो बीजेपी ने आगामी लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना और एनसीपी में हुए असंतोष का पूरा फायदा उठाने की रणनीति बनाई है। अजित पवार गुट को अचानक सरकार में शामिल किया जाना, वो भी तब जब शिंदे सरकार के पास बहुमत से ज्यादा विधायकों की संख्या मौजूद है। यह एक तीर से कई शिकार करने जैसा है। इससे जहां लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत की संभावना बढ़ गई है, वहीं शिंदे गुट का कद भी कम किया गया हैं। यह भी पढ़े-महाराष्ट्र: CM पद के लिए पहली पसंद शिंदे, दूसरे नंबर पर फडणवीस? सर्वे पर BJP ने कही बड़ी बात
दरअसल एकनाथ शिंदे शिवसेना को विभाजित करने में सफल रहे और यहां तक कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी हासिल कर लिया, लेकिन वें अभी यह सुनिश्चित नहीं कर सके है कि शिवसेना के वोटर भी उनके साथ खड़े है। इस बात का सबूत बीते कुछ महीनों में हुए चुनाव के नतीजे दे रहे है। यही वजह है कि बीजेपी को संदेह है कि क्या अकेले शिंदे के साथ 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में अच्छे परिणाम हासिल हो सकते है। 2019 में तो बीजेपी और अविभाजित शिवसेना राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से 41 जीतने में कामयाब रहीं थी। इस बार भी अगर मोदी सरकार को दिल्ली में अपना तीसरा कार्यकाल हासिल करना है तो महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन दोहराना पड़ेगा। यही वजह है कि अजित पवार को एनडीए (NDA) में शामिल कर बीजेपी अपना खेमा और मजबूत कर रही है।
Updated on:
15 Jul 2023 06:03 pm
Published on:
15 Jul 2023 05:59 pm
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