
पीएम मोदी और शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल (Photo: IANS/File)
Punjab Politics: पंजाब की राजनीति में भाजपा (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच गठबंधन की चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। कभी लंबे समय तक सहयोगी रहे दोनों दलों ने 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में अलग-अलग चुनाव लड़ा। दोनों चुनावों के नतीजों ने यह साफ किया कि दोनों पार्टियों के पास अपना-अपना मजबूत वोट आधार है, लेकिन अकेले दम पर निर्णायक जीत हासिल करने की स्थिति अभी भी नहीं है। बता दें कि SAD ने कृषि कानूनों के मुद्दे पर छह साल पहले भाजपा का साथ छोड़ दिया था।
शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद पंजाब की राजनीति में SAD के भाजपा नीत एनडीए में फिर जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले अकाली दल एक बार फिर भाजपा के साथ हाथ मिला सकता है।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और SAD ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों दलों ने पंजाब की सभी 13 सीटों पर स्वतंत्र रूप से उम्मीदवार उतारे। इन दोनों चुनावों के आंकड़ों की तुलना करें तो BJP और अकाली दल की राजनीतिक ताकत और कमजोरियां एक-दूसरे की पूरक नजर आती हैं।
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में BJP ने अकाली दल के साथ पुराना गठबंधन खत्म करके अकेले चुनाव लड़ा था। पार्टी ने 117 में से 73 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। हालांकि, BJP को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली। पठानकोट और मुकेरियां विधानसभा सीटें उसके खाते में आईं।
पार्टी का वोट शेयर करीब 6.6 फीसदी रहा। इस नतीजे से संकेत मिला कि पंजाब में BJP का संगठनात्मक और सामाजिक आधार अभी सीमित है। पार्टी को शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत समर्थन मिला, लेकिन ग्रामीण पंजाब में वह व्यापक जनाधार बनाने में सफल नहीं रही।
2024 के लोकसभा चुनाव में BJP ने पंजाब की सभी 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा। इस बार पार्टी के वोट शेयर में बड़ा उछाल देखने को मिला। BJP ने 18.56 फीसदी वोट हासिल किए। लेकिन इतने बड़े वोट शेयर के बावजूद पार्टी के खाते में एक भी लोकसभा सीट नहीं आई।
यह आंकड़ा पंजाब की चुनावी राजनीति को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। करीब पांचवां हिस्सा वोट हासिल करने के बावजूद BJP सीटों में उसका फायदा नहीं बदल सकी। यानी पंजाब में BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल वोट बढ़ाना नहीं, बल्कि वोट को सीट में बदलना भी है।
हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनावों का गणित अलग होता है। विधानसभा चुनाव में स्थानीय नेतृत्व, राज्य सरकार का प्रदर्शन, खेती-किसानी, रोजगार, कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाएं और स्थानीय मुद्दे मतदाताओं के फैसले पर ज्यादा असर डाल सकते हैं। इसलिए BJP यह मानकर नहीं चल सकती कि लोकसभा में मिला 18.56 फीसदी वोट विधानसभा चुनाव में भी उसी तरह दोहराया जाएगा।
शिरोमणि अकाली दल के आंकड़े BJP से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में SAD को 18.38 फीसदी वोट मिले थे, जो BJP के 6.6 फीसदी से काफी अधिक थे। इसके बावजूद अकाली दल केवल तीन सीटें जीत पाया।
इसका बड़ा कारण आम आदमी पार्टी की जबरदस्त लहर थी। AAP ने 117 में से 92 सीटों पर जीत हासिल कर पंजाब की सत्ता पर कब्जा कर लिया था।
2024 का लोकसभा चुनाव अकाली दल के लिए और मुश्किल साबित हुआ। पार्टी ने सभी 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा और उसका वोट शेयर घटकर 13.42 फीसदी रह गया। उसे सिर्फ बठिंडा लोकसभा सीट पर जीत मिली।
अकाली दल के लिए सबसे बड़ी चिंता उसके वोट शेयर में लगातार गिरावट है। 2019 के लोकसभा चुनाव में SAD को पंजाब में करीब 27.45 फीसदी वोट मिले थे। 2024 में यह आंकड़ा घटकर 13.42 फीसदी रह गया। यानी कुछ ही वर्षों में अकाली दल का पारंपरिक जनाधार काफी कमजोर हुआ है।
यही वह जगह है जहां भाजपा और अकाली दल का पुराना गठबंधन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी पंजाब के ग्रामीण इलाकों और सिख मतदाताओं के बीच सीमित पहुंच रही है। वहीं, पार्टी को शहरी क्षेत्रों, व्यापारियों, शहरी मध्यम वर्ग और हिंदू मतदाताओं के कुछ हिस्सों में ज्यादा मजबूत समर्थन मिलता है।
दूसरी तरफ अकाली दल के पास पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में संगठनात्मक नेटवर्क, क्षेत्रीय पहचान और लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक आधार है। भाजपा अकेले वह ग्रामीण नेटवर्क तैयार नहीं कर पाई है, जिसे अकाली दल ने दशकों में बनाया है।
यानी भाजपा के पास शहरी ताकत है तो SAD के पास ग्रामीण संगठन और क्षेत्रीय आधार। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच गठबंधन का तर्क दिया जा रहा।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को पंजाब में 18.56 फीसदी और SAD को 13.42 फीसदी वोट मिले। दोनों का संयुक्त वोट शेयर करीब 31.98 फीसदी बैठता है। यह आंकड़ा अपने आप में चुनावी जीत की गारंटी नहीं है। भाजपा को जहां लोकसभा चुनाव में 18.56 फीसदी वोट के बावजूद एक भी सीट नहीं मिली, वहीं SAD 13.42 फीसदी वोट के साथ सिर्फ एक सीट जीत सका।
अगर दोनों दल भविष्य में गठबंधन पर विचार करते हैं तो दोनों को इससे अलग-अलग फायदे मिल सकते हैं।
BJP के लिए सबसे बड़ी जरूरत ग्रामीण पंजाब और सिख मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाना है। अकाली दल इस दिशा में उसके लिए महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकता है।
वहीं SAD को शहरी पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत करने और BJP के बढ़ते वोट आधार तक पहुंच बनाने की जरूरत है। दोनों पार्टियां साथ आती हैं तो एक-दूसरे की कमजोरियों को काफी हद तक पूरा करने की कोशिश कर सकती हैं।
इसके बावजूद भाजपा और SAD के लिए दोबारा साथ आना इतना आसान नहीं होगा। दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरी पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। किसान आंदोलन और 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद पंजाब की राजनीति और मतदाताओं का रुझान भी काफी बदला है।
भाजपा ने 2022 के 6.6 फीसदी वोट शेयर से 2024 में 18.56 फीसदी तक पहुंचकर यह संकेत दिया है कि वह पंजाब में अपना स्वतंत्र संगठन और जनाधार बढ़ाना चाहती है। वह लंबे समय तक किसी क्षेत्रीय दल पर निर्भर नहीं रहना चाहती। दूसरी ओर, SAD अब पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं है। इसलिए यदि दोनों दल गठबंधन की मेज पर लौटते हैं तो सीटों का बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। इन सब के बावजूद दोनों दलों की ताकत को जोड़ने वाला गठबंधन राजनीतिक रूप से दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
Updated on:
10 Aug 2026 11:17 am
Published on:
10 Aug 2026 11:09 am
