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TISS में उमर खालिद-शरजील इमाम के समर्थन में नारे, दो छात्रों को नहीं मिली जमानत; कोर्ट ने बताई वजह

Mumbai Sessions Court Latest News: TISS में उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में कथित नारे लगाने के मामले में मुंबई कोर्ट ने दो छात्रों की अग्रिम जमानत खारिज कर दी, जबकि सात अन्य छात्रों को राहत मिली।
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मुंबई

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Imran Sheikh

Aug 08, 2026

TISS Students

TISS में उमर खालिद-शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाने पर दो छात्रों की जमानत खारिज। (फोटो सोर्स- ANI)

TISS Students: टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के दो छात्रों को अदालत से राहत नहीं मिली है। मुंबई की सेशंस कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में कथित नारे लगाने के मामले में दोनों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। वहीं, इसी केस में सात दूसरे छात्रों को अग्रिम जमानत दे दी गई है।

यह मामला अक्टूबर 2025 में TISS परिसर में हुए एक कार्यक्रम से जुड़ा है। यह कार्यक्रम दिवंगत जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि देने के लिए रखा गया था। पुलिस के मुताबिक, 12 अक्टूबर की शाम करीब 7:30 से 8:30 बजे के बीच 10 से 12 छात्र एक हॉस्टल के पास जमा हुए थे।

पुलिस का आरोप है कि इस कार्यक्रम के लिए संस्थान से पहले अनुमति नहीं ली गई थी। इसी दौरान कुछ छात्रों ने उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के समर्थन में नारे लगाए। मामले की शुरुआत ट्रॉम्बे पुलिस ने की थी, लेकिन बाद में जांच CID को सौंप दी गई।

श्रद्धांजलि देने के दौरान क्या हुआ?

जांच एजेंसी के मुताबिक, छात्रों ने जीएन साईबाबा की तस्वीरें लगाईं, मोमबत्तियां जलाईं और उनकी लिखी कविताएं पढ़ीं। वहां कुछ पोस्टर भी लगाए गए थे। छात्रों की ओर से इसे श्रद्धांजलि कार्यक्रम बताया गया। कोर्ट ने भी माना कि साईबाबा को श्रद्धांजलि देना अपने आप में अपराध नहीं है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने साईबाबा को बरी किया था।

लेकिन कोर्ट के सामने मामला सिर्फ श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा। जज वीबी बोहरा ने कहा कि कथित तौर पर लगाए गए नारे कार्यक्रम के मकसद से आगे जाते दिखाई देते हैं।

मोबाइल और लैपटॉप की जांच में क्या मिला?

जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के मोबाइल फोन और लैपटॉप जब्त किए। पुलिस का दावा है कि इनमें माओवादी संगठन से जुड़े लोगों की प्रकाशित कुछ किताबें और दूसरी सामग्री मिली। जांच एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ जानकारी डिलीट की गई थी।

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि सिर्फ माओवादी साहित्य डाउनलोड करना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। फिर भी कोर्ट ने कहा कि इस सामग्री को मामले में लगाए गए दूसरे आरोपों के साथ जोड़कर देखना जरूरी है।

दो छात्रों को जमानत क्यों नहीं मिली?

अदालत ने कहा कि दोनों छात्रों से हिरासत में पूछताछ की जरूरत हो सकती है। कोर्ट के मुताबिक, जांच में यह पता लगाना जरूरी है कि कथित नारे लगाने के पीछे उनकी मंशा क्या थी और बरामद सामग्री का इस मामले से कोई संबंध है या नहीं।

कोर्ट ने जांच में कथित तौर पर पूरा सहयोग नहीं करने और कुछ दूसरे आरोपों का भी जिक्र किया। एक छात्र के खिलाफ पहले से दर्ज एक मामले का भी अदालत ने संज्ञान लिया। फिलहाल दोनों छात्रों को अग्रिम जमानत नहीं मिली है। वहीं सात अन्य छात्रों को कोर्ट ने राहत दे दी है। मामले की जांच अभी जारी है।