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मुजफ्फरनगर दंगा: घर छोड़कर गए लोगों को वापस लाने में जुटे संजीव प्रधान, मुस्लिम बोले- हमारी जिंदगी पर उनका उधार है

2013 दंगों के बाद जो परिवार अपने गांव छोड़कर चले गए उनकी वापसी का सपना लिए संजीव प्रधान लगातार प्रयास कर रहे हैं।

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sanjeev

मुजफ्फरनगर दंगा: घर छोड़कर गए लोगों को वापस लाने में जुटे संजीव प्रधान, मुस्लिम बोले- हमारी जिंदगी पर उनका उधार है

मुजफ्फरनगर। 2013 दंगों के बाद जो परिवार अपने गांव छोड़कर चले गए उनकी वापसी का सपना लिए संजीव प्रधान लगातार प्रयास कर रहे हैं। उन्हें आज भी इंतजार है कि जो मुस्लिम परिवार दंगे के चलते मुजफ्फरनगर स्थित उनके गांव दुल्हेड़ा को छोड़कर चले गए वह अब वापस आ जाएं।

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दरअसल, दंगे के चलते मुजफ्फरनगर के शाहपुर क्षेत्र स्थित गांव दुल्हेड़ा में 65 मुस्लिम परिवारों को 2013 अगस्त और सितंबर में घर छोड़ना पड़ा था। गांव के पूर्व प्रधान संजीव प्रधान इनमें से 30 परिवारों को मनाकर वापस ला चुके हैं।

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बताया जाता है कि 2013 दंग की आग में जब मुजफ्फरनगर झुलस रहा था, तब 42 वर्षीय इस शख्स ने कई मुस्लिम परिवारों की मदद की और अपने घर में उन्हें शरण दी थी। इसके साथ ही उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर शरणार्थियों की रक्षा भी की थी। दंगों के बाद घर छोड़कर जाने वाली अफसाना बेगम जो 4 साल बाद गांव लौटकर आईं हैं बताती हैं, 'मुझे आज भी याद है कि कैसे वह (संजीव) और उनके साथी हमारी मस्जिद की सुरक्षा कर रहे थे। उन्होंने इसे किसी को भी छूने तक नहीं दिया। अपनी जान जोखिम में डालकर उन्होंने हमारी सुरक्षा की।’

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संजय प्रधान कहते हैं कि 'मुसलमान खराब हैं? या हिंदू खराब हैं? मैं कहता हूं कि इंसान खराब हैं। हम लोगों को किसी धर्म के आधार पर जज नहीं करना चाहिए बल्कि उनके व्यवहार को देखना चाहिए। वहीं संजीव के इस सरहानीय कार्य के लिए उन्हीं के जाट समुदाय के लोगों की आलोचना भी झेलनी पड़ी।

उनके एक समर्थक नवाब सिंह बताते हैं कि '2015 में संजीव प्रधान ने प्रधान का चुनाव जीता था और इसके पीछे अल्पसंख्यकों को दंगों में मदद करना ही प्राथमिक वजह बनी। इस दौरान कुछ हिंदू उन्हें ताने मारते हुए 'सलाम-अलाइकुम' बोलने लगे थे और यह दावा करते थे कि वह अब लगभग मुस्लिम ही हैं।'

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बाला बानो उन दिनों को याद करते हुए आज भी कांप जाती हैं। वह बताती हैं कि 'हम डर और अनिश्चितता से भरे हुए थे। अगर संजीव वहां नहीं होते तो शायद हम बच नहीं पाते। उन्होंने बताया कि सितंबर 2013 के पहले जब स्थिति ज्यादा बिगड़नी शुरू हुई तो संजीव ने हमारे घर के आदमियों को वापस बुला लिया। जो उस समय शहर से बाहर गए हुए थे और सुरक्षा की दृष्टि से हम लोगों को संजीव अपने घर ले गए। वह हर रात भर अपने घर से बाहर चौकन्ना होकर बैठे रहते थे। हमारी जिंदगी पर उनका उधार है।'

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अफसाना याद करते हुए कहती हैं कि कैसे संजीव ने 300 से ज्यादा मुस्लिमों के लिए पलहेरा और शाहपुर के राहत कैंप में व्यवस्था की थी। वह भी हमारे साथ राहत कैंपों में आना चाहते थे, लेकिन हमने ही उन्हें बोला कि वह अपनी जान जोखिम में न डालें। हालांकि उन्होंने हमारे लिए बग्घियों की व्यवस्था की। जिसकी मदद से हम राहत कैंप तक पहुंच पाए। हम काफी डरे हुए थे लेकिन उनके साथी जो सभी जाट थे पूरे रास्ते हमारे साथ चले और हमारी रक्षा की।

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