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नागौर. जिले सहित प्रदेश में विभिन्न बैंकों की ओर से दिए जाने जाने फसली ऋण में बैंकर्स जमकर किसानों की जेब काट रहे हैं। बैंकर्स भोले किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के तहत ऋण देकर ब्याज के साथ अन्य हिडन चार्ज वसूलते हैं, लेकिन किसान उसे ब्याज समझकर रुपए जमा करवा देता है। कुछ जागरूक किसान सवाल-जवाब करने का प्रयास करते हैं तो उन्हें समयाभाव का बहाना कर रवाना कर देते हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि जब से सरकार ने बैंक रेगुलेशन अधिनियम 1949 में धारा 21(क) जोड़ कर संशोधन किया है, तब से बैंकर्स उसका नाजायज फायदा उठाकर मूलधन से अधिक ब्याज वसूल रहे हैं। दो दिन पूर्व कुचामन क्षेत्र के चारणवास गांव में किसान मंगलराम ने आत्महत्या करने का कदम सरकार की गलत नीतियों व बैंक अधिकारियों की मनमानी के कारण ही उठाया है। मंगलराम को कुर्की का नोटिस जारी करवाने वाले पंजाब नेशनल बैंक के अरबों रुपए नीरव मोदी अकेला डकार गया, लेकिन बैंक के प्रशासनिक अधिकारी एक-दूसरे पर आरोप लगाकर रह गए।
एक बार इंस्पेक्शन, बार-बार वसूली
दरअसल, किसी भी किसान को केसीसी के तहत ऋण जारी करने से पहले बैंक की टीम किसान के खेतों का भौतिक सत्यापन करने के लिए निरीक्षण करती है। इसके एवज में ढाई से तीन हजार रुपए इंस्पेक्शन चार्ज काटा जाता है। एक बार केसीसी जारी होने के पांच साल बाद केसीसी को पूरी तरह रिन्युअल करवाना होता है, इस बीच बैंक की टीम कभी भी इंस्पेक्शन करने नहीं जाती, लेकिन बैंकर्स हर वर्ष इंस्पेक्शन चार्ज ब्याज के साथ जोड़ देते हैं। किसान को मजबूरी में रुपए जमा कराने पड़ते हैं, क्योंकि उसकी सुनने वाला कोई नहीं है।
जानिए, बैंकों की मनमानी को सरकार कैसे दे रही है शह
केन्द्र सरकार ने बैंक रेगुलेशन अधिनियम 1949 में वर्ष 1984 में संशोधन करके धारा 21(क) जोड़ दी, जिसके तहत बैंक द्वारा लगाए गए ब्याज एवं अन्य चार्ज के खिलाफ उपभोक्ता सिविल कोर्ट में नहीं जा सकता तथा बैंक मूलधन से ज्यादा ब्याज वसूल कर सकता है। जबकि पहले यदि बैंक मूलधन से अधिक ब्याज वसूल करता था तो अति ब्याज उधार अधिनियम के तहत उपभोक्ता बैंक के खिलाफ कोर्ट में जा सकता था। बैंकों की मनमानी को शह देने के लिए सरकार ने रोड़ा एक्ट पारित किया, जिसके तहत किसान द्वारा ऋण जमा नहीं कराने पर बैंक अधिकारी जिला कलकटर या उप जिला कलक्टर के समक्ष अर्जी पेश करता है और कलक्टर या एसडीएम किसानों को नोटिस जारी कर कुर्की कर सकते हैं।
ऐसे करते हैं किसानों से वसूली
केसीसी के तहत किसानों को सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से दिए जाने वाले फसली ऋण को यदि किसान समय पर जमा करवाता है तो उसे केन्द्र सरकार की ओर से 3 प्रतिशत ब्याज की रिबेट मिलती है। इस प्रकार यदि कोई किसान समय पर ब्याज जमा करवाए तो उसके मात्र 4 प्रतिशत ब्याज लगता है, यानी एक लाख रुपए के ऋण का ब्याज मात्र 4 हजार रुपए लगना चाहिए, लेकिन बैंकर्स ब्याज के साथ इंस्पेक्शन (निरीक्षण) चार्ज, फसल बीमा का प्रीमियम, पैनल्टी आदि चार्ज जोड़ देते हैं। गौरतलब है कि नागौर सांसद सीआर चौधरी खुद बैंकों द्वारा किसानों से वसूले जाने वाले हिडन चार्ज का मुद्दा तीन साल पहले लोकसभा में उठा चुके हैं।
यह सरकार की बौद्धिक बेईमानी है
राज्य सरकार ऋण माफी को लेकर जितना प्रचार कर रही है, उसकी तुलना में काफी कम ऋण माफी हुई है। यह सरकारी की बौद्धिक बेईमानी है। सरकार ने कृषि ऋण माफ करने की घोषणा की थी, लेकिन केवल को-ऑपरेटिव बैंक से दिए गए ऋण (50 हजार तक) को माफ किया गया है, जबकि किसानों पर ज्यादा ऋण तो दूसरे बैंकों के केसीसी के तहत है, लेकिन केसीसी का ऋण माफ नहीं किया गया। आम किसान यही समझता है कि उसका भी ऋण माफ हो गया। ऐसी स्थिति में जब कुर्की का नोटिस मिलता है तो आत्महत्या जैसी घटनाएं सामने आती है। मंगलराम आत्महत्या मामले में पूरी तरह सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
रामपाल जाट, राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान महापंचायत
सरकार की नीतियां जिम्मेदार
किसान मंगलराम मेघवाल द्वारा आत्महत्या करने के पीछे सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। मामूली ऋण बकाया के लिए उसे जमीन कुर्की का नोटिस देकर एसडीएम ने मंगलराम को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। जबकि सरकार को एक बैंक विशेष के ऋण को माफ नहीं करके सभी किसानों का कर्ज, चाहे वह किसी भी बैंक से लिया हुआ हो, माफ करना चाहिए था।
विमल सोनी, शहर अध्यक्ष, जिला किसान, खेत एवं मजदूर कांग्रेस
Published on:
08 Aug 2018 03:02 pm
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