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शिक्षा और धर्म की अनूठी मिसाल बना राजस्थान का यह सरकारी विद्यालय, जानिए खास बातें

Nagaur News : आजादी के बाद जब राजस्थान में देशी रियासतों की सत्ता समाप्त होने पर लोकतंत्र की बुनियाद रखी जा रही थी उसी समय सरकारी विद्यालयों की स्थापना का दौर शुरू हुआ।

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Khajwana government school

राजवीर रोज/खजवाना (नागौर)। आजादी के बाद जब राजस्थान में देशी रियासतों की सत्ता समाप्त होने पर लोकतंत्र की बुनियाद रखी जा रही थी उसी समय सरकारी विद्यालयों की स्थापना का दौर शुरू हुआ। लेकिन अध्यापन के लिए न तो शिक्षक थे और न ही विद्यालय के लिए भवन।

ऐसे में सरकारी शिक्षक के तौर पर यूपी के रिछपालसिंह व रामेश्वरलाल अध्यापक के रूप में खजवाना में नियुक्त हुए। लेकिन विद्यालय भवन को लेकर आ रही परेशानी का कोई हल नहीं निकल रहा था। शिक्षा के महत्व को समझते हुए रामस्नेही संप्रदाय के संत भक्तराम महाराज ने रामद्वारा की भूमि विद्यालय के लिए दान की।

ग्रामीणों ने राशि एकत्रित कर बनवाया भवन

ग्रामीण रामनिवास जाखड़ व रामकिशोर मुंडेल ने बताया कि रामद्वारा में झोंपड़ी बनी हुई थी। सेठ सोहनलाल कोठारी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने कस्बे सहित आस पास के दर्जनभर गांवों से राशि एकत्रित कर चार कमरों का निर्माण करवाकर प्राथमिक विद्यालय की शुरूआत करवाई। उस समय 10 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यालय आते थे। वर्तमान में करीब 200 विद्यार्थी 26 कमरों के विद्यालय भवन में बैठकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

41 शिक्षकों की टीम ने किया आर्थिक सहयोग

कोरोना काल में तत्कालीन प्राचार्य भंवरलाल जाट के निर्देशन में पीईईओ क्षेत्र के 41 शिक्षकों की एक टीम ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस भूमि पर स्थित संत नारायणदास महाराज की समाधिस्थल का जीर्णोद्धार कर दान की गई भूमि की उपयोगिता को बढ़ा दिया। इससे संतों का ऋण चुकता हुआ, वहीं समाज को नई ऊर्जा और प्रेरणा मिली है। शिक्षकों ने ना केवल एक लाख 28 हजार रुपए का आर्थिक सहयोग किया, बल्कि जीर्णोद्वार कार्य के दौरान श्रमदान कर श्रद्धा भी प्रकट की।

रामस्नेही संप्रदाय का प्रमुख स्थान है रामद्वारा

रामस्नेही संप्रदाय की मुख्य पीठ शाहपुरा के संत रामचरण महाराज के प्रमुख शिष्य व चतुर्थ पीठाधीश्वर संत नारायणदास महाराज का स्माधिस्थल खजवाना में है। तत्कालीन महंत भक्तराम महाराज ने विद्यालय के लिए यह भूमि दान की। साथ ही समाधिस्थलों के संरक्षण की जिम्मेदारी दी थी, लेकिन बीते 75 वर्षों में पहली बार इस स्थल की सुध ली गई।

इन्होंने ने किया सहयोग

शिक्षकों की पहल को देखते हुए विद्यायय के पूर्व छात्र व सेवानिवृत सहायक अभियंता देवकृष्ण लामरोड़ ने करीब एक लाख साठ हजार रुपए की लागत से कोटा स्टोन से समाधिस्थल का आंगन तैयार करवाया। ग्रामीण हरसुखराम चौटिया ने ध्यान केन्द्र में बिजली फिटिंग व पंखा लगवाया, वहीं धारूराम लेगा ने परिक्रमा द्वार का निर्माण करवाया।

प्राथमिक विद्यालय से महाविद्यालय तक का सफर

संतों ने जिस भूमि को शिक्षा के लिए दान किया था उस भूमि पर बने भवन में प्राथमिक विद्यालय से लेकर महाविद्यालय तक की कक्षाएं संचालित हो चुकी है। गत वर्ष खजवाना में महाविद्यालय स्वीकृत होने के बाद अस्थायी तौर पर इसी भवन में कॉलेज की कक्षाएं संचालित हो रही हैं।


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