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नागौर.
सरकार की एक गलती की सजा जिले के 72 खान संचालकों सहित करीब पांच हजार कामगारों को बेरोजगारी के तौर पर मिली है। दो साल पहले ही भंग हुई पर्यावरण की स्वीकृति देने वाली राज्य स्तरीय कमेटी का गठन का आज तक नहीं किया सका। इसकी वजह से हालात बेहद खराब हो गए हैं। पीडि़तों ने इस संबंध में वनमंत्री सहित प्रदेश के आला स्तर के अधिकारियों के यहां भी दस्तक दी,लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की। प्रशासनिक व्यवस्था से हैरान-परेशान दो दर्जन से अधिक खान संचालक शुक्रवार को जिला कलक्टर के पास पहुंचे, और बोले की हमारी क्या गलती है-आखिर सरकार हमें क्यों बर्बाद करने पर आमादा है। कमेटी का गठन नहीं किया तो फिर हमें खान संचालन की अनुमति ही दे दो।
केवल पर्यावरण स्वीकृति के अभाव में बंद
जिले के फिरोजपुरा,जुजाला, खेड़ा नारनोलिया, पातेली, बोडवा, पालड़ी जोधा, छावटा, रूपाथल एवं इंदोकली आदि क्षेत्रों की चाइना क्ले की कुल 72 खानें केवल पर्यावरण स्वीकृति के अभाव में दो साल से बंद हैं। इसकी वजह से खान संचालकों एवं इसमें काम करने वाले स्थानीय कामगारों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। 72 में से 13 ऐसी खानें हैं, जो सभी की औपचारिकताओं की पूर्ति करने के बाद केवल पर्यावरण स्वीकृति के अभाव में आज तक चालू नहीं हो सकी।
कलक्टर साब-हमारी क्या गलती है
श्री गुसाई बाबा क्ले सोसायटी, झुुंझाला यूनियन के बैनरतले पहुंचे खान संचालकों ने जिला कलक्टर के समक्ष अपने गुस्से और दर्द का इजहार किया। श्री गुसाई बाबा क्ले सोसायटी के अध्यक्ष भूराराम भाकर व लक्ष्मीनारायण दाधीच ने शुक्रवार को जिला कलक्टर के साथ हुई मुलाकात के दौरान सवाल पूछा कि राज्य स्तरीय कमेटी का गठन राज्य सरकार ने नहीं किया तो इसमें हमारी क्या गलती है। कमेटी भंग होने के कारण पर्यावरण स्वीकृति आज तक नहीं मिल पाई। हालांकि पहले 72 में से 59 खानों का संचालन पूर्व में एनओसी मिलने के कारण चल रहा था, लेकिन बाद में पर्यावरण स्वीकृति अनिवार्य हुई तो फिर कमेटी का गठन ही नहीं किया गया। कलक्टर की ओर से इस संबंध में जल्द ही संबंधित मंत्रालय में पत्र भेजकर उनकी समस्या का निराकरण कराने के लिए आश्वस्त किया गया।
खामी जिम्मेदारों की, और हालात इनके बिगड़े
विभागीय जानकारों के अनुसार दो साल पूर्व राज्य स्तरीय पर्यावरण कमेटी का कार्यकाल समाप्त हो गया था। कार्यकाल समाप्त होने के साथ कमेटी भी भंग हो गई। अब नई कमेटी का गठन फिलहाल अब तक सरकार की ओर से नहीं किया जा सका। इसकी वजह से नई स्वीकृतियों का काम भी पूरी तरह से ठप हो चुका है।
बी टू में होने के बाद भी बी वन में डाल दिया
पीडि़त खान संचालकों का कहना है कि जीरो से 25 हेक्टर तक खनन पट्टा के पर्यावरण की स्वीकृति की श्रेणी बी-2 आती है। इसकी अनुमति का जिला स्तरीय कमेटी से ही स्वीकृति का प्रावधान होता है, जबकि बी-1 के श्रेणी अनुमति राज्य स्तरीय कमेटी से होती है। ऐसे में बी-2 श्रेणी में होते हुए भी उनका प्रकरण स्वीकृति के लिए बी-1 में कर दिए जाने के कारण राज्य स्तरीय कमेटी के लिए नामित कर दिया गया। इस तकनीकी खामी के कारण उनकी स्वीकृति का मामला अटक गया।
Published on:
30 Jun 2018 04:41 am
