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कवि सम्मेलन- ‘झूठ की बखियां उधड़ी तो सच रो पड़ा’

देर रात तक काव्य रस का रसास्वादन करते रहे श्रोता, सियासी भ्रष्टाचार से लेकर बेटियां, गरीबी, देशभक्ति के साथ हास्य रस की कविताओं से सजा मंच

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नागौर. नागौर क्लब में आयोजित कवि सम्मेलन में काव्यपाठ करते कवि पार्थ नवीन।

नागौर. सच की बखिया उधड़ती रहीं और सच आहें भरता रहा। देर रात तक सजे कवि सम्मेलन में कवियों ने बढ़ते भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किए तो गंदी होती राजनीति को भी निशाने पर लिया। नेताओं की कथनी और करनी के साथ शोषित वर्ग की पीड़ा भी गूंजी। पैरोडी गीतों के माध्यम से ठहाके लगे तो तवायफों की बदनसीबी पर दर्द झलका। शिक्षाविद् मनमोहन मानव स्मृति संस्थान की ओर से नागौर क्लब में शुक्रवार रात वासुदेव नांधू की स्मृति में कवि सम्मेलन हुआ। देशभक्ति की रचनाओं के बीच हर रस से श्रोता भीगे। आनंद रत्नू के एक गीत ने समां बांध दिया।

' इक दर्द छिपा है ठेकों के ठिकाने में, इक दर्द पिघलता है गहरे तहखानों में, सब साथ-साथ पहुंचे जिस्मों की दुकानों में' गीत में वो सच्चाई बयान की जिसे सुनकर हर कोई स्तब्ध सा रह गया। हकीकत के इतना नजदीक इस गीत पर रत्नू ने श्रोताओं की खूब दाद बटोरी। इसके अलावा उन्होंने बंजर-बंजर हमें सारी रात जगाते हैं सुनाया। पार्थ नवीन ने नीति भी बदल गई, नेता भी बदल गए के साथ मन भी हिंदुस्तानी-मन भी हिंदुस्तानी से प्रशंसा बटोरी।

इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ सभापति कृपाराम सोलंकी ने दीप प्रज्वलित कर किया। राजेंद्र नांधू ने अतिथियों का स्वागत किया। उज्जैन के अशोक भाटी ने संचालन करते हुए पीते हैं तो तबीयत खराब होती है, नहीं पीते हैं तो नीयत खराब होती हैं सुनाकर श्रोताओं को आनंदित किया। प्राख्यात कवि राजेश विद्रोही ने 'ये पांखें बीनता बचपन हमें महफूज रखना है, इन्हीं बच्चों के खातिर तो परिंदे पर बदलते हैं' गजल से वाहवाही लूटी। इंदौर के मुकेश मालवा ने 'सरहद पर लडऩे वाले देहाती मां के बेटे हैं', कोटा के निशमुनि गौड़ ने 'हम रंग में हैं वो जंग में हैं' तो भीलवाड़ा के दीपक पारीक ने 'सारे रिश्ते हुए कलंकित आज बेटियां कहती है, सर पर कोई हाथ फिराने में तो डर लगने लगता है' सुनाकर आज के हालात के अलग-अलग रंग बताए। प्रहलाद सिंह झोरड़ा ओ बताऊं देखतो जां मुरधरा री रीत ने तो राजकुमार बादल ने 'यह दौर है नया-नया बदलाव आरिया, कमा रिया है भूत और पलीत खा रिया' सुनाया। रतलाम की सुमित्रा सरल ने बेटियों के त्याग को बताया। ' अपने मतलब में बेटे बेच देते हैं पगड़ी को, बेटियां बाप का मस्तक नहीं झुकने देतीं' सुनाकर दाद पाई। हास्य रस के कवि अशोक जॉन बैरागी ने हास्य विधा से श्रोताओं को हंसाया। राजेन्द्रसिंह नांधू ने कवियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। सभापति कृपाराम सोलंकी ने अतिथियों का आभार ज्ञापित किया।