
दिल्ली में नाबालिग द्वारा गंभीर अपराधों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। (Photo: ChatGpt)
नागौर. जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और खेल का सामान होना चाहिए, उसी उम्र में कई बच्चे हत्या, हत्या के प्रयास, चोरी, वाहन चोरी और अवैध हथियार रखने जैसे गंभीर अपराधों में पकड़े जा रहे हैं। प्रदेश में बाल अपराध का स्वरूप लगातार चिंताजनक होता जा रहा है। बाल अपराधों के आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान में राजस्थान के 40 बाल सम्प्रेषण गृहों में कुल 515 बालक निरुद्ध हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जिनकी उम्र महज 14 से 16 वर्ष के बीच है और वे गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल पाए गए हैं।
विधायक हरिमोहन शर्मा की ओर से विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में गृह विभाग की ओर से दी गई सूचना के अनुसार वर्ष 2023 से 2025 के बीच प्रदेश के लगभग सभी जिलों में नाबालिगों के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, चोरी, पोक्सो एक्ट, छेड़छाड़, मारपीट, नकबजनी, वाहन चोरी, लूट, आम्र्स एक्ट, एनडीपीएस एक्ट और अन्य गंभीर अपराध दर्ज हुए हैं और हर वर्ष ऐसे बच्चों की संख्या 2 से ढाई हजार तक है। कई जिलों में हत्या और हत्या के प्रयास जैसे मामलों में भी किशोरों की संलिप्तता सामने आई है।
ज्यादातर मामलों में वयस्क रहे साथ
पुलिस अधिकारियों एवं विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश मामलों में किशोर अकेले अपराध नहीं करते, बल्कि उनके साथ पहले से अपराध जगत से जुड़े वयस्क होते हैं। यही वयस्क उन्हें चोरी, वाहन चोरी, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल करते हैं, ताकि पुलिस उन पर शक नहीं करे। पुलिस रिकॉर्ड भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि बाल अपचारियों के साथ वयस्क आरोपियों की संख्या अधिक रहती है। ऐसे मामलों में नाबालिगों का इस्तेमाल इसलिए भी किया जाता है क्योंकि किशोर न्याय कानून के तहत उनके लिए अलग कानूनी प्रक्रिया लागू होती है।
सामाजिक और पारिवारिक कारण
बढ़ते बाल अपराधों के पीछे सामाजिक और पारिवारिक कारण भी सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार स्कूल छोडऩा, पारिवारिक तनाव, नशे की लत, गलत संगति, सोशल मीडिया का दुष्प्रभाव और आसान पैसे की चाह बच्चों को अपराध की ओर धकेल रही है। कई मामलों में आर्थिक तंगी और अभिभावकों की निगरानी का अभाव भी बड़ी वजह बन रहा है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल कानून का डर इस समस्या का समाधान नहीं है। परिवार, स्कूल, समाज और प्रशासन को मिलकर ऐसे बच्चों की समय रहते पहचान कर उन्हें परामर्श, शिक्षा और पुनर्वास से जोडऩा होगा। यदि शुरुआती स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में बाल अपराध का ग्राफ और बढ़ सकता है।
बच्चों बढ़ रहा डेविएंट बिहेवियर
आजकल के बच्चों डेविएंट बिहेवियर बढ़ रहा है, जो समाज के तय नियमों, मानदंडों और अपेक्षाओं को तोड़ता है। कई बार आदतन अपराधी जानबूझकर बच्चों का उपयोग करते हैं। इसके साथ आजकल जो गैंगस्टर कल्चर चल रहा है, जिसमें अपराधियों को समाज में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है, फिल्में भी ऐसी ही बन रही हैं, ये बच्चों पर बहुत ज्यादा प्रभाव डालता है। इसके साथ जब बच्चे आर्थिक, सामाजिक एवं भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस करते हैं तो भी अपराधों की तरफ खींचे चले जाते हैं। शिक्षा का भी बड़ा योगदान है, हमारी शिक्षा में नैतिक शिक्षा पर जोर देने की आवश्यकता है।
- जतिन जैन, आइपीएस अधिकारी, नागौर
संवाद हीनता एव सोशल मीडिया का प्रभाव बड़ा कारण
बच्चों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्तियों का सबसे बड़ा कारक संवादहीनता एवं सोशल मीडिया का प्रभाव है। सोशल मीडिया एवं आसपास की परिस्थितियां बाल मन को अविलंब प्रभावित करती है। इससे जाने - अनजाने वे ऐसे अपराध कर बैठते हैं, जिसके परिणाम से यह अनभिज्ञ रहते हैं। इसलिए आवश्यक है बच्चों में निरन्तर संवाद हो। प्रतिदिन की हर गतिविधियों पर परिजन मॉनिटरिंग करें, ताकि समय से पूर्व बच्चों को उनसे दूर किया जा सके।
- मनोज सोनी, अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति न्यायपीठ, नागौर
Updated on:
30 Jul 2026 09:34 pm
Published on:
30 Jul 2026 09:34 pm
