
सांभर झील
नागौर. देश की सबसे बड़ी खारे पानी की सांभर झील तेजी से पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रही है। अवैध नमक खनन, भूजल के अंधाधुंध दोहन, नदियों पर बने बांधों, प्रदूषण और अनियमित बारिश के कारण झील का प्राकृतिक जल क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है। इसके साथ ही झील के आसपास का भूगर्भीय पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि हाल के वर्षों में झील में पक्षियों की मौत की घटनाएं बढ़ी हैं तथा जैव विविधता और खाद्य शृंखला पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
नागौर के श्री बीआर मिर्धा राजकीय महाविद्यालय, नागौर के रसायन शास्त्र विभाग के सहायक आचार्य डॉ. लाखाराम की ओर से किए शोध में नावां तहसील के भूजल को लेकर भी गंभीर तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन में सामने आया कि इस क्षेत्र में भूजल प्रदूषण के पीछे भूगर्भीय संरचना के साथ-साथ मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। ग्रेनाइट एवं तलछटी चट्टानों में मौजूद फ्लोराइड युक्त खनिजों के विघटन और भूजल की क्षारीय प्रकृति के कारण फ्लोराइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वहीं सांभर क्षेत्र में नमक उत्पादन के लिए बोरवेल से अत्यधिक लवणीय जल निकालने से भूजल का संतुलन भी बिगड़ रहा है।
खेती और पेयजल दोनों के लिए बढ़ता खतरा
सहायक आचार्य के शोध अनुसार खेती के नजरिए से ज्यादा खारापन और सोडियम कैल्शियम का अनुपात फसल की पैदावार और मिट्टी की गुणवत्ता के लिए खतरा उत्पन्न करते हैं। इसलिए झील में भूजल के सावधानीपूर्वक प्रबंधन की आवश्यकता है। उन्होंने भविष्य में नैनो टेक्नोलॉजी एवं माइक्रोबियल डी-फ्लोरिडेशन तकनीकों के पायलट परीक्षण की सिफारिश की है। साथ ही फ्लोराइड, अधिक लवणता और हानिकारक सूक्ष्म जीवों से निपटने के लिए बहु-स्तरीय जल शोधन प्रणाली अपनाने की सलाह दी है। अध्ययन में कम लागत वाले सामुदायिक जल शोधन मॉडल, वर्षा जल संचयन और सतही जल स्रोतों के अधिक उपयोग को भी दीर्घकालिक समाधान बताया गया है।
प्राकृतिक जल स्तर लगातार घट रहा
उधर, नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और वीआईटी-एपी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की ओर से करीब 39 वर्ष तक किए गए अध्ययन में सामने आया कि झील का प्राकृतिक जल स्तर लगातार घट रहा है, जबकि नमक उत्पादन के लिए बनाए गए कृत्रिम पैन तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही झील में हानिकारक एल्गल ब्लूम (काई) का विस्तार भी चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। अध्ययन में सामने आया कि वर्ष 2022 में एल्गल ब्लूम ने झील के प्राकृतिक जल क्षेत्र के करीब 43 प्रतिशत हिस्से को प्रभावित कर दिया था। इससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटता है और सूक्ष्म जीवों से लेकर फ्लेमिंगो जैसे प्रवासी पक्षियों तक पूरी खाद्य शृंखला प्रभावित होती है।
मानव स्वास्थ्य पर दिखेंगे दीर्घकालिक दुष्प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अवैध नमक खनन, भूजल दोहन और प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो सांभर झील का पारिस्थितिकी तंत्र और अधिक कमजोर होगा। इसका असर केवल प्रवासी पक्षियों और जैव विविधता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आसपास के क्षेत्रों की कृषि, पेयजल गुणवत्ता, उद्योगों और मानव स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक दुष्प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। सांभर झील को बचाने के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, भूजल संरक्षण और अवैध गतिविधियों पर सख्त रोक समय की सबसे बड़ी आवश्यकता मानी जा रही है।
कूबड़ पट्टी के नाम से बदनाम
राजस्थान की कूबड़ पट्टी में स्थित नावां तहसील में सदियों से फ्लोरोसिस की बीमारी व्याप्त है। मानसून से पहले तथा मानसून के बाद भूजल गुणवत्ता मापदंडों के मूल्यांकन से इस प्रदूषण स्तर का भयावह स्तर सामने आया है। इस क्षेत्र में भूगर्भ में स्थित ग्रेनाइट और तलछटी संरचनाओं में पाए जाने वाले फ्लोराइड खनिजों जैसे फ्लोरोऐपटाइट, बायोटाइट, मास्कोवाइट, आदि के विघटन भी भूजल में फ्लोराइड के उच्च स्तर के लिए उत्तरदायी है। इस क्षेत्र में पीएच- फ्लोराइड संबंधों की स्थिरता, फ्लोराइड संदुषण के भूवैज्ञानिक मूल को पुष्ट करती है।
- डॉ. लाखाराम, सहायक आचार्य, रसायन शास्त्र विभाग, बीआर मिर्धा राजकीय महाविद्यालय, नागौर
Updated on:
28 Jul 2026 09:33 pm
Published on:
28 Jul 2026 09:33 pm
