
नागौर. टोल प्लाजा कर्मचारियों की ओर से वाहन चालकों के साथ आए दिन दुव्र्यवहार करने की शिकायतें मिलने व घटनाएं होने पर करीब 9 साल भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने टोल प्लाजा कर्मचारियों के लिए वर्दी निर्धारित की थी। ताकि इस प्रकार के मामलों की गुंजाइश नहीं रहे, लेकिन जिले में संचालित ज्यादातर टोल प्लाजा पर कोई भी कर्मचारी वर्दी में नजर नहीं आता। ऐसे में यह पहचान नहीं हो पाती है कि टोल पर खड़ा व्यक्ति कर्मचारी है या कोई और। ऐसे व्यक्ति आए दिन वाहन चालकों के साथ दुव्र्यवहार करते हैं और जब पुलिस कार्रवाई होती है तो टोल प्लाजा संचालक यह कहकर बच जाते हैं कि अमूक व्यक्ति उनके यहां काम नहीं करता। जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी व लापरवाही के चलते कई जगह तो टोल संचालक बाउंसर तक रखने लग गए हैं, जो वाहन चालकों के साथ छोटी-छोटी बात पर मारपीट करने को उतारू रहते हैं।
गौरतलब है कि एनएचएआई ने 2 फरवरी 2016 में जब टोल प्लाजा कर्मचारियों के लिए वर्दी अनिवार्य की तो उसके साथ यह भी निर्देश दिए कि टोल के स्टाफ को लोगों से बातचीत का लहजा भी सिखाया जाए। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वाहन चालक से सलीके से बात कर सके, लेकिन वर्तमान में टोल पर ड्यूटी करने वाले अधिकतर कर्मचारी न तो पूरे पढ़े-लिखे हैं और न ही उन्हें ढंग से बात करना आता है। इसके बावजूद इसकी जांच नहीं होती। दरअसल, टोल प्लाजा पर आम वाहन चालकों के साथ स्टाफ की ओर अभद्र व्यवहार की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर एनएचएआई ने टोलकर्मियों की तैनाती के संबंध नया सर्कुलर जारी किया था, जिसके मुताबिक टोल पर तैनात कर्मचारियों के लिए ड्रेसकोड लागू होने के साथ ही उन्हें शिष्टाचार सिखाने के लिए 7 दिन की ट्रेनिंग भी दी जानी थी, लेकिन 9 साल बीतने के बावजूद अब तक यह बदलाव टोल नाकों पर देखने को नहीं मिल रहा है।
गाली-गलौच और मारपीट करना आम बात
टोल नाकों पर बिना यूनिफार्म और पहचान पत्र के तैनात रहने वाले कर्मचारी टोल टैक्स वसूलने के दौरान वाहन सवार लोगों से अभद्र व्यवहार करते हैं। टोल नाके पर ठेकेदार के पाले हुए लोग न सिर्फ वाहन चालकों के साथ दादागिरी के अंदाज मेंं बात करते हैं, बल्कि गाली-गलौच और मारपीट को आमादा रहते हैं। पहचान स्पष्ट नहीं होने की वजह से इसमें दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई भी नहीं हो पाती है। गत वर्ष गोगेलाव टोल पर हुई घटना में एक वाहन चालक के साथ गंभीर मारपीट हुई थी, जिसे जोधपुर रेफर करना पड़ा था।
एम्बुलेंस, क्रेन व पेट्रोलिंग वाहन प्रोपर नहीं
टोल प्लाजा पर एक एम्बुलेंस, एक क्रेन और एक पेट्रोलिंग वाहन रखना अनिवार्य है। इसके लिए ठेकेदारों को हर माह 7 लाख रुपए का भुगतान किया जाता है। इसके बावजूद जिले सहित प्रदेश के अधिकतर टोल नाकों पर न तो प्रोपर एम्बुलेंस और क्रेन मिलती है और न ही पेट्रोलिंग वाहन। यदि किसी ठेकेदार ने वाहन खड़े भी कर दिए तो उनके लिए ड्राइवर नहीं मिलते। ज्यादातर जगह एम्बुलेंस व क्रेन चलाने वाला चालक एक ही होता है, जबकि 8-8 घंटे की शिफ्ट के हिसाब से प्रत्येक वाहन के लिए तीन-तीन कर्मचारी रखने अनिवार्य हैं, लेकिन कोई भी ठेकेदार इसकी पालना नहीं कर रहा। यही हाल टोल कर्मियों का है, टोल वसूली करने वाले कर्मचारियों को भी 8-8 घंटे की शिफ्ट में काम करवाना होता है, लेकिन यहां लगे कर्मचारी 12-12 घंटे से ज्यादा काम कर रहे हैं।
ऐसी है टोल कलेक्शन कर्मचारी की ड्रेस
एनएचएआई की ओर से निर्धारित ड्रेस कोड के अनुसार टोल कलेक्शन कर्मचारियों को नेवी-ब्लू रंग की शर्ट और ट्राउजर पहनना अनिवार्य है। सिर पर स्पोर्ट कैप व उस पर संबंधित कंपनी का मोनो छपा होना चाहिए। सिक्योरिटी बैल्ट के बक्कल पर भी मोनो होना जरूरी है। सेफ्टी जैकेट और काले रंग के जूते पहनने जरूरी हैं।
अधिकारी काम नहीं कर रहे
हमारे देश में 60 प्रतिशत दुर्घटनाएं और मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों पर होती हैं, जो कुल सडक़ों का केवल 5 प्रतिशत है। इसमें भी 75 प्रतिशत मृत्यु एनएचएआईसडक़ों पर होती हैं, यह गंभीर है। अमूमन ज्यादातर टोल प्लाजा पर कर्मचारी वर्दी में नहीं रहते, जबकि एनएचएआई ने 9 साल पहले इस संबंध में निर्देश जारी किए थे। आईआरसी कोड के अनुसार टोल प्लाजा की एम्बुलेंस में न तो दवा मिलती है और न ही ड्राइवर। इसलिए समय पर घायलों को उपचार नहीं मिल पाता है। यदि जिम्मेदार अधिकारी जमीनी स्तर पर सही काम करें तो स्थिति में सुधार आ सकता है।
- महावीरसिंह, सेवानिवृत्त आरएएस व रोड सेफ्टी, एक्सपर्ट, देसलसर
Published on:
26 Feb 2025 10:39 am
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