3 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नागौर की विरासत का इतिहास के सुनहरे पर्दे पर अंकित है नाम, दे​खिए तस्वीरें

विश्व धरोहर दिवस विशेष world heritage day : आज भी विरासत से रूबरू होने आते हैं देश-विदेश से लोग नागौर जिले में मीरा महल सहित कई पुरातात्विक धरोहर उपेक्षा की शिकार- धीरे-धीरे हो री खंडहर, समय पर ध्यान नहीं दिया गया तो मिट जाएगा अस्तित्व

4 min read
Google source verification
The name of Nagaur's heritage is written on golden screen of history

The name of Nagaur's heritage is written on golden screen of history

नागौर. नागौर, राजस्थान के मध्य में स्थित एक ऐतिहासिक जिला है, जो पुरातात्विक धरोहरों की दृष्टि से भी काफी धनी और सम्पन्न है। प्रदेश के हृदय स्थल में स्थित नागौर का पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण स्थान है। नागौर लोक देवताओं व संतों की जन्म व कर्मस्थली रहा है। 2 अक्टूबर 1959 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने नागौर में पंचायतीराज का दीप प्रज्वलित भी नागौर में ही किया था।

world heritage day ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में नागौर प्राचीन नगरों में से एक है। संस्कृत लेखों में इसे अहिछत्रपुर और नागपुर से उल्लेखित किया गया है। जैन समाज के हस्तलिखित ग्रंथों में इसका नाम नागउर लिखा मिलता है जो धीरे-धीरे नागौर में परिवर्तित हो गया। शौर्य, त्याग, भक्ति व बलिदान से ओतप्रोत नागौर जिला प्राचीन काल से ही समृद्ध संस्कृति का प्रतिबिंब रहा है। यानी नागौर की विरासत का नाम इतिहास के सुनहरे पर्दे पर अंकित है, लेकिन अब उस विरासत को संजोकर रखने के साथ संरक्षण की भी आवश्यकता है, अन्यथा आने वाली पीढिय़ां केवल किताबों में ही पढ़ पाएंगी।

नागौर शहर की धरोहर
नागौर की प्राचीन इमारतों अहिछत्रपुर किला अपने आप में विशेष है, जिसमें बने विभिन्न महल आज भी हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। 1570 ई. में अकबर ने नागौर में दरबार लगाया था। इसलिए किले में अकबर महल भी है। इसके साथ शहर में बने सात दरवाजे भी पुरातात्विक धरोहर हैं। शहर के उत्तर पूर्वी भाग में सुल्तानु तारकिन हम्मीदुद्दीन नागौरी की दरगाह और गिन्नाणी तालाब के पास ऐतिहासिक बगीचियां बनी हुई हैं। नागौर की प्राचीन इमारतों में तारकिन का दरवाजा प्रसिद्ध है, जिसे 1230 ई. में इल्तुतमिश ने बनवाया था। जाली झरोखों से पुरानी तरह के बने मकान इस शहर की पुरानी बसावट को आबाद करते हैं। शहर के हृदयस्थल में ऐतिहासिक बंशीवाला मंदिर है।

कुचामन शहर व खींवसर के किले
जिले के कुचामन का किला राजस्थान के सबसे पुराने और सबसे दुर्गम किलों में से एक है। एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह किला अद्वितीय जल संचयन प्रणाली का परिचायक है। इसी प्रकार रेगिस्तान के बीच में बना खींवसर का किला भी करीब 500 साल पुराना है। दोनों ही किले अब होटल में परिवर्तित हो गए हैं।

जिले के इन मंदिरों का विशेष स्थान
जिले में स्थित विभिन्न प्राचीन मंदिर न केवल धार्मिक आस्था के केंन्द्र हैं, बल्कि पुरातात्विक धरोहर भी है, जो सदियों से अपनी स्थापत्य कला एवं बनावट को लेकर देशभर में विशेष पहचान रखते हैं।
- जिले के जायल क्षेत्र के गोठ मांगलोद का दधिमती माता मंदिर जिले का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है, जिसका निर्माण गुप्त वंश (चौथी शताब्दी) के दौरान किया गया था।
- मेड़ता का मीरा बाई मंदिर, चारभुजा मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। करीब 400 साल पुराना है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु एवं पर्यटक आते हैं।
- 10वीं सदी के लाडनूं के जैन मंदिर ऐतिहासिक होने के साथ आकर्षण के केन्द्र हैं।
- रामस्नेही सम्प्रदाय की चार पीठों में से एक प्रसिद्ध पीठ रेण में है। रामस्नेही समुदाय के आदि आचार्य दरियावजी ने यहां तपस्या की थी।


छतरियों से आबाद है जिला
- जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्रों में बनी ऐतिहासिक छतरियां भी विरासत का अहम हिस्सा है। नागौर में वीर अमरसिंह राठौड़ व उनकी रानियों की छतरियां हैं तो मुंदियाड़, संखवास, रूण आदि गांवों में तालाब किनारे बनी छतरियां आज भी अपने आप में खास हैं। इसी प्रकार जिले के लगभग हर गांव में ऐसी प्राचीन कलात्मक छतरियां हैं, जिनकों अब संरक्षण की दरकार है।

खाटू का इतिहास भी कम नहीं
पृथ्वीराज रासो के अनुसार खाटू का पुराना नाम खटवान था। पुराना खाटू लगभग नष्ट हो चुका है। अब दो गांव हैं, एक को बड़ी खाटू और दूसरे को छोटी खाटू कहा जाता है। बड़ी खाटू की पहाड़ी पर एक छोटा सा किला खड़ा है। किले का निर्माण पृथ्वीराज चौहान ने करवाया था। छोटी खाटू में एक पुराना बावड़ी स्थित है, जिसे फूल बावड़ी के नाम से जाना जाता है, ऐसा माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण गुर्जर प्रतिहार काल में किया गया था। यह बावड़ी अपनी स्थापत्य शैली में कलात्मक है। यहां बनी कलात्मक प्राचीन इमारत, जिसे तबेला कहा जाता है, उसे भी सरंक्षण की दरकार है।

यहां ऐसी बावडिय़ां, जिन्हें देखकर ही बुझ जाती थी प्यास
जिले के नागौर सहित खाटू, कुचामन, मेड़ता, नावां, ताऊसर, मारोठ, डीडवाना, रियां बड़ी सहित अन्य कस्बों में बनी बावडिय़ां बरसों पहले आम के साथ खास लोगों की प्यास बुझाती थी। इनमें कई बावडिय़ां ऐसी हैं, जिनकी बनावट व स्थापत्य कला देखकर ही मन खुश हो जाता था। ये ऐतिहासिक बावडिय़ां आज देखरेख के अभाव में अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं।

जसनगर का नीलकंठ महादेव मंदिर
जिले के जसनगर में नौवीं व दसवीं सदी के दौरान निर्मित यह मंदिर वास्तुशिल्प एवं स्थापत्यकला की दृष्टि से जिले का महत्वपूर्ण शिव मंदिर है। नागर शैली में बना यह मंदिर समकालीन मंदिर वास्तुशिल्प से युक्त गर्भगृह, अंतराल, सभा मंडप आदि संपूर्ण अवयवों से युक्त है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है जो कि क्षेत्र का सबसे बड़ा शिवलिंग माना जाता है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार 6 शाखाओं से निर्मित है, जिनमें लता पत्र बिजोरा कुसुमलता से अलंकृत हैं, मुख्य द्वार के दांई ओर गंगा और वाहिनी यमुना व रामायाण, महाभारत के प्रसंग से जुड़ी दृश्य को मूर्तियों के माध्यम से सुंदर अंकन किया हुआ है।

भंवाल की भंवाल माता
भंवाल माता का मंदिर नागौर जिले के भंवाल गांव में स्थित है। यहां माता काली व ब्राह्मणी दो स्वरूप में पूजी जाती है। मंदिर प्रांगण में प्राप्त शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1119 में हुआ था। मंदिर प्राचीन हिन्दू स्थापत्य कला के अनुसार तराशे गए पत्थरों को आपस में जोड़ कर बनाया गया था। सीमेंट जैसे तत्वों का उपयोग नहीं किया गया। मंदिर के चारों और देवी-देवताओं की सुन्दर प्रतिमाएं व कारीगरी की गई है। मंदिर के ऊपरी भाग में गुप्त कक्ष बनाया गया था, जिसे गुफा भी कहा जाता है। कहते हैं इसके द्वार को बंद करने के लिए भारी पत्थर का उपयोग होता था।